{"s":"dev","lang":"hi","v":{"part-1":{"l":["बहुत समय पहले एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसकी पत्नी के सात बेटे थे। घर धन-धान्य से भरा था और बच्चों की हँसी से गूँजता रहता था।"]},"part-2":{"l":["दीवाली से कुछ दिन पहले साहूकारनी घर लीपने के लिए मिट्टी लाने जंगल की ओर गई। वहाँ एक टीले के पास वह कुदाल से मिट्टी खोदने लगी।"]},"part-3":{"l":["उस टीले में एक सेही (स्याहु) की माँद थी, जिसमें उसके छोटे-छोटे बच्चे रहते थे। अनजाने में साहूकारनी की कुदाल एक बच्चे को लग गई और वह मर गया।"]},"part-4":{"l":["यह देखकर साहूकारनी का मन काँप उठा। उसे अपनी भूल पर बहुत पछतावा हुआ। वह भारी मन से मिट्टी लेकर घर लौट आई, पर यह बात किसी से कह न सकी।"]},"part-5":{"l":["कुछ समय बाद उसके बेटे एक-एक करके बीमार पड़ने लगे, और एक वर्ष के भीतर सातों बेटे चल बसे। साहूकारनी का दुख कहने से बाहर था। वह दिन-रात रोती रहती थी।"]},"part-6":{"l":["एक दिन उसने गाँव की बड़ी-बूढ़ी स्त्रियों के सामने अपना मन खोल दिया। उसने रोते हुए कहा, “मैंने जान-बूझकर कोई पाप नहीं किया। अनजाने में सेही का बच्चा मुझसे मर गया था। तभी से मेरा सब कुछ उजड़ गया।”"]},"part-7":{"l":["स्त्रियों ने उसे ढाढ़स बँधाया और कहा, “तुमने अपनी भूल सच्चे मन से मान ली है, इससे तुम्हारा आधा पाप धुल गया। अब कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता का व्रत रखो। दीवार पर सेही और उसके बच्चों का चित्र बनाकर अहोई माता की पूजा करो और अपनी भूल की क्षमा माँगो।”"]},"part-8":{"l":["साहूकारनी ने वैसा ही किया। अष्टमी के दिन उसने सुबह से व्रत रखा। शाम को दीवार पर अहोई माता, सेही और उसके बच्चों का चित्र बनाया, जल से भरा करवा रखकर पूजा की और सच्चे मन से क्षमा माँगी। रात को तारे निकलने पर उसने तारों को अर्घ्य दिया और तब व्रत खोला। हर वर्ष वह यह व्रत इसी श्रद्धा से करती रही।"]},"part-9":{"l":["अहोई माता उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हुईं। कहते हैं, उनकी कृपा से साहूकारनी के सातों बेटे उसे फिर मिल गए, और घर में फिर से खुशियाँ लौट आईं।"]},"part-10":{"l":["तभी से माताएँ अपनी संतान की लंबी आयु और सुख के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं। वे दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाकर पूजा करती हैं और तारे देखकर व्रत खोलती हैं।"]},"closing":{"l":["हे अहोई माता, जैसे आपने साहूकारनी की सूनी गोद फिर भर दी, वैसे ही सबकी संतान की रक्षा करना और सबकी गोद हरी-भरी रखना। बोलो अहोई माता की जय!"]}}}