{"s":"dev","lang":"hi","v":{"veeravati-1":{"l":["बहुत पुराने समय की बात है। एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे थे और एक बेटी, जिसका नाम वीरावती था। सातों भाई अपनी इकलौती बहन को बहुत प्यार करते थे और उसे खिलाए बिना ख़ुद खाना नहीं खाते थे।"]},"veeravati-2":{"l":["वीरावती का विवाह हुआ। विवाह के बाद जब पहला करवा चौथ आया, तब वह अपने मायके में थी। उसने अपनी भाभियों के साथ सुबह से निर्जल व्रत रखा। दिन भर न कुछ खाया, न पानी पिया।"]},"veeravati-3":{"l":["शाम होते-होते भूख और प्यास से वीरावती बेहाल हो गई। भाई घर लौटे तो बहन को मुरझाया हुआ देखकर उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने कहा, “बहन, कुछ खा लो।” वीरावती बोली, “आज करवा चौथ है। चाँद को अर्घ्य देकर ही खाऊँगी।”"]},"veeravati-4":{"l":["चाँद निकलने में अभी बहुत देर थी। भाइयों ने एक उपाय सोचा। सबसे छोटा भाई दूर एक पीपल के पेड़ पर चढ़ गया और उसने दीया जलाकर छलनी की ओट में रख दिया। दूर से वह रोशनी ऐसी लगती थी, जैसे चाँद निकल आया हो।"]},"veeravati-5":{"l":["भाई बहन के पास आए और बोले, “देखो, चाँद निकल आया है। अर्घ्य दे दो।” भाभियों ने उसे समझाना चाहा कि यह चाँद नहीं है, पर भोली वीरावती ने भाइयों की बात मान ली। उसने उस रोशनी को अर्घ्य दिया और खाना खाने बैठ गई।"]},"veeravati-6":{"l":["पहले कौर में बाल निकला। दूसरे कौर पर उसे छींक आ गई। तीसरा कौर उठाया ही था कि ससुराल से ख़बर आई कि उसके पति अब इस संसार में नहीं रहे।"]},"veeravati-7":{"l":["वीरावती रोती-बिलखती ससुराल पहुँची। उसी रात इंद्र की पत्नी, देवी इंद्राणी, धरती पर आईं। वीरावती ने उनके चरण पकड़ लिए और पूछा, “मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?” इंद्राणी ने कहा, “तुमने असली चाँद देखे बिना व्रत खोल दिया। तुम्हारे भाइयों ने प्रेम में आकर तुमसे छल किया था।”"]},"veeravati-8":{"l":["इंद्राणी ने आगे कहा, “अब पूरे वर्ष हर महीने की चौथ का व्रत श्रद्धा से रखो। अगले करवा चौथ पर पूरे नियम से व्रत करो और असली चाँद को अर्घ्य दो। तब तुम्हारा सुहाग लौट आएगा।”"]},"veeravati-9":{"l":["वीरावती ने किसी को अपने पति का दाह-संस्कार नहीं करने दिया। वह पूरे वर्ष उनके पास बैठी रही, उनकी सेवा करती रही और हर महीने की चौथ का व्रत रखती रही। मन ही मन वह करवा माता का स्मरण करती रहती थी।"]},"veeravati-10":{"l":["फिर करवा चौथ आया। इस बार वीरावती ने सुबह से निर्जल व्रत रखा, शाम को करवा भरकर गौरी माँ की पूजा की और कथा सुनी। जब असली चाँद निकला, तब उसने छलनी से चाँद को देखा और अर्घ्य दिया।"]},"veeravati-11":{"l":["उसकी सच्ची श्रद्धा से करवा माता प्रसन्न हुईं। उनके आशीर्वाद से वीरावती का पति ऐसे उठ बैठा, जैसे गहरी नींद से जागा हो। कहते हैं, तभी से सुहागिनें यह व्रत पूरे नियम से रखती हैं और चाँद को देखकर, अर्घ्य देकर ही व्रत खोलती हैं।"]},"karva-1":{"l":["अब करवा माता की दूसरी कथा सुनिए। बहुत पहले एक नदी के किनारे बसे गाँव में करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में नहाने गया।"]},"karva-2":{"l":["नहाते समय एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया और उसे पानी में खींचने लगा। पति ने ज़ोर से करवा को पुकारा। करवा दौड़कर आई और उसने कच्चे सूत के धागे से मगर को बाँध दिया। उसके सतीत्व के बल से मगर ऐसा बँधा कि हिल भी न सका।"]},"karva-3":{"l":["फिर करवा यमराज के पास पहुँची और बोली, “हे यमराज, इस मगर ने मेरे पति को पकड़ा है। इसे अपने लोक ले जाइए और मेरे पति को लंबी आयु दीजिए।” यमराज ने कहा, “अभी इस मगर की आयु बाक़ी है। मैं इसे नहीं ले जा सकता।”"]},"karva-4":{"l":["करवा ने कहा, “यदि आप ऐसा नहीं करेंगे, तो मैं आपको शाप दे दूँगी।” पतिव्रता के शाप से यमराज भी डर गए। उन्होंने मगर को यमलोक भेज दिया और करवा के पति को लंबी आयु का वरदान दिया।"]},"karva-5":{"l":["तभी से करवा को करवा माता के रूप में याद किया जाता है। करवा चौथ पर सुहागिनें उनसे अपने पति की रक्षा और लंबी आयु की प्रार्थना करती हैं।"]},"closing":{"l":["हे करवा माता, जैसे आपने वीरावती का सुहाग लौटाया और करवा के पति की रक्षा की, वैसे ही सबके सुहाग की रक्षा करना। बोलो करवा माता की जय!"]}}}