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Nityaनित्य
सुखकर्ता दुःखहर्ता
Sukhkarta Dukhharta
सुखकर्ता दुःखहर्ता सत्रहवीं सदी के संत समर्थ रामदास की गणेश जी की मराठी आरती है। "जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती" टेक और तीन पदों में गणपति को सुख देने वाला और दुख हरने वाला कहा गया है, और उनके सिंदूरी रूप, आभूषणों और तीन नेत्रों का वर्णन है। महाराष्ट्र में लगभग हर गणेश पूजा इसी से शुरू होती है, और गणेशोत्सव में सुबह-शाम यही गाई जाती है।
टेक
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मन कामना पूर्ती॥
जय हो देव, जय हो, हे मंगलमूर्ति, आपकी जय हो। आपके दर्शन मात्र से मन की कामनाएँ पूरी हो जाती हैं।
पद १
सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची।
नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची।
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥
आप सुख देने वाले और दुख हरने वाले हैं; विघ्नों का नाम तक नहीं रहने देते। आप भरपूर प्रेम देते हैं और आपकी कृपा सब तक पहुँचती है। आपके सारे अंग सिंदूर के लेप से सुंदर हैं, और गले में मोतियों की माला झिलमिलाती है।
टेक
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मन कामना पूर्ती॥
पद २
रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा।
चंदनाची उटी कुंकुम केशरा।
हिरेजडित मुकुट शोभतो बरा।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया॥
हे गौरी-पुत्र, आप रत्नों से जड़ा आभूषण पहनते हैं, और आप पर चंदन, कुमकुम और केसर का लेप है। हीरों से जड़ा मुकुट आप पर खूब सजता है, और चरणों में घुँघरू वाले नूपुर रुनझुन करते हैं।
टेक
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मन कामना पूर्ती॥
पद ३
लंबोदर पीतांबर फणिवरबंधना।
सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना।
दास रामाचा वाट पाहे सदना।
संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवरवंदना॥
हे लंबोदर, पीतांबरधारी, नागराज को कमरबंद बनाए हुए; सीधी सूँड, वक्रतुंड और तीन नेत्रों वाले। राम का यह दास घर पर आपकी राह देख रहा है। संकट में दौड़कर आइए और अंत समय में रक्षा कीजिए, हे श्रेष्ठ देवताओं से वंदित।
टेक
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
दर्शनमात्रे मन कामना पूर्ती॥