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Nityaनित्य

आरती कुंजबिहारी की

Aarti Kunj Bihari Ki

आरती कुंजबिहारी की भगवान श्रीकृष्ण की सबसे प्रिय आरतियों में से एक है। उत्तर भारत और विदेश में बसे भारतीयों के घरों व मंदिरों में इसे गाया जाता है। ब्रज के रंग वाली हिंदी में एक टेक और चार पद हैं, जिनमें वृंदावन के कृष्ण मुरली, मोर-मुकुट और वैजयंती माला के साथ राधा के संग दिखते हैं। इसे रोज़ गाते हैं, और ख़ासकर जन्माष्टमी की आधी रात को।

टेक

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

यह आरती वृंदावन के कुंजों में विहार करने वाले कुंजबिहारी की है, गोवर्धन धारण करने वाले श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

पद १

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।

श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।

लतन में ठाढ़े बनमाली,

भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,

ललित छवि श्यामा प्यारी की॥

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

उनके गले में वैजयंती माला है और वे बालक रूप में मधुर मुरली बजाते हैं। कानों में कुण्डल झिलमिलाते हैं। वे नंद के आनंद, नंदलाल हैं। उनके अंगों की कांति आकाश के समान श्यामल है और उनके साथ, हे सखी, राधिका चमक रही हैं। वनमाली लताओं के बीच खड़े हैं: भौंरों जैसी काली अलकें, कस्तूरी का तिलक और चंद्रमा-सी झलक। यह आरती राधा के प्रिय उस ललित छवि वाले श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की है।

टेक

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

पद २

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।

गगन सों सुमन रासि बरसै,

बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग,

अतुल रति गोप कुमारी की॥

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

उनके सिर पर स्वर्णमय मोर-मुकुट शोभा पाता है और देवता भी उनके दर्शन को तरसते हैं। आकाश से फूलों की राशि बरसती है। मुरचंग और मधुर मृदंग बजते हैं और वे ग्वालिनों के संग हैं। यह आरती गोप-कुमारियों के अतुलनीय प्रेम के आश्रय श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की है।

टेक

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

पद ३

जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा।

स्मरन ते होत मोह भंगा,

बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच,

चरन छवि श्रीबनवारी की॥

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

जिन चरणों से गंगा प्रकट हुईं, वे सबका मन हरने वाली श्री गंगा हैं। उनके स्मरण से मोह भंग हो जाता है। वे शिव के सिर पर जटाओं के बीच बसीं और पाप रूपी कीचड़ को हरती हैं। यह आरती श्री बनवारी के उन्हीं चरणों की छवि की है, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

टेक

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

पद ४

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।

चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू,

हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद,

टेर सुन दीन दुखारी की॥

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

यमुना-तट की उज्ज्वल रेत चमक रही है और वृंदावन में बाँसुरी बज रही है। चारों ओर गोपियाँ, ग्वाल-बाल और गौएँ हैं। चाँदनी रात में वे मृदु मंद मुस्कान बिखेरते हैं और संसार के फंदे कट जाते हैं। यह आरती दीन-दुखियों की पुकार सुनने वाले श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की है।

टेक

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

स्रोत: Traditional Braj/Hindi aarti as printed in popular aarti-sangrah booklets; text cross-checked against BhaktiBharat.com, Drik Panchang (Hindi) and two further lyric collections (chantchalisa.com, hindibhajanlyrics.co.in)

ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।

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