आरती कुंजबिहारी की
Aarti Kunj Bihari Ki
आरती कुंजबिहारी की भगवान श्रीकृष्ण की सबसे प्रिय आरतियों में से एक है। उत्तर भारत और विदेश में बसे भारतीयों के घरों व मंदिरों में इसे गाया जाता है। ब्रज के रंग वाली हिंदी में एक टेक और चार पद हैं, जिनमें वृंदावन के कृष्ण मुरली, मोर-मुकुट और वैजयंती माला के साथ राधा के संग दिखते हैं। इसे रोज़ गाते हैं, और ख़ासकर जन्माष्टमी की आधी रात को।
- 5 पद
- 4 मिनट
- पारंपरिक (रचयिता अज्ञात)
- उत्तम दिन: बुधवार
आरती कुंजबिहारी की,Aarti Kunj Bihari Ki,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥Shri Girdhar Krishna Murari Ki
यह आरती वृंदावन के कुंजों में विहार करने वाले कुंजबिहारी की है, गोवर्धन धारण करने वाले श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।Gale Mein Baijanti Mala, Bajave Murli Madhur Bala
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।Shravan Mein Kundal Jhalkala, Nand Ke Anand Nandlala
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।Gagan Sam Ang Kanti Kali, Radhika Chamak Rahi Aali
लतन में ठाढ़े बनमाली,Latan Mein Thade Banmali
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,Bhramar Si Alak, Kasturi Tilak, Chandra Si Jhalak
ललित छवि श्यामा प्यारी की॥Lalit Chhavi Shyama Pyari Ki
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥Shri Girdhar Krishna Murari Ki
उनके गले में वैजयंती माला है और वे बालक रूप में मधुर मुरली बजाते हैं। कानों में कुण्डल झिलमिलाते हैं। वे नंद के आनंद, नंदलाल हैं। उनके अंगों की कांति आकाश के समान श्यामल है और उनके साथ, हे सखी, राधिका चमक रही हैं। वनमाली लताओं के बीच खड़े हैं: भौंरों जैसी काली अलकें, कस्तूरी का तिलक और चंद्रमा-सी झलक। यह आरती राधा के प्रिय उस ललित छवि वाले श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की है।
आरती कुंजबिहारी की,Aarti Kunj Bihari Ki,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥Shri Girdhar Krishna Murari Ki
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।Kanakmay Mor Mukut Bilse, Devta Darsan Ko Tarse
गगन सों सुमन रासि बरसै,Gagan Son Suman Raasi Barse
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग,Baje Murchang, Madhur Mirdang, Gwalin Sang
अतुल रति गोप कुमारी की॥Atul Rati Gop Kumari Ki
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥Shri Girdhar Krishna Murari Ki
उनके सिर पर स्वर्णमय मोर-मुकुट शोभा पाता है और देवता भी उनके दर्शन को तरसते हैं। आकाश से फूलों की राशि बरसती है। मुरचंग और मधुर मृदंग बजते हैं और वे ग्वालिनों के संग हैं। यह आरती गोप-कुमारियों के अतुलनीय प्रेम के आश्रय श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की है।
मुरचंग एक छोटा धातु का वाद्य है जो आज भी ब्रज और राजस्थान में बजाया जाता है।
आरती कुंजबिहारी की,Aarti Kunj Bihari Ki,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥Shri Girdhar Krishna Murari Ki
जहां ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा।Jahan Te Prakat Bhai Ganga, Sakal Man Harini Shri Ganga
स्मरन ते होत मोह भंगा,Smaran Te Hot Moh Bhanga
बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच,Basi Shiv Sees, Jata Ke Beech, Hare Agh Keech
चरन छवि श्रीबनवारी की॥Charan Chhavi Shri Banwari Ki
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥Shri Girdhar Krishna Murari Ki
जिन चरणों से गंगा प्रकट हुईं, वे सबका मन हरने वाली श्री गंगा हैं। उनके स्मरण से मोह भंग हो जाता है। वे शिव के सिर पर जटाओं के बीच बसीं और पाप रूपी कीचड़ को हरती हैं। यह आरती श्री बनवारी के उन्हीं चरणों की छवि की है, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
परंपरा के अनुसार गंगा भगवान के वामन (त्रिविक्रम) रूप के चरण से निकलीं और पृथ्वी पर उतरते समय शिव की जटाओं में समा गईं।
आरती कुंजबिहारी की,Aarti Kunj Bihari Ki,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥Shri Girdhar Krishna Murari Ki
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।Chamakti Ujjwal Tat Renu, Baj Rahi Vrindavan Benu
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू,Chahun Disi Gopi Gwal Dhenu
हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद,Hansat Mridu Mand, Chandni Chand, Katat Bhav Phand
टेर सुन दीन दुखारी की॥Ter Sun Deen Dukhari Ki
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥Shri Girdhar Krishna Murari Ki
यमुना-तट की उज्ज्वल रेत चमक रही है और वृंदावन में बाँसुरी बज रही है। चारों ओर गोपियाँ, ग्वाल-बाल और गौएँ हैं। चाँदनी रात में वे मृदु मंद मुस्कान बिखेरते हैं और संसार के फंदे कट जाते हैं। यह आरती दीन-दुखियों की पुकार सुनने वाले श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की है।
आरती कुंजबिहारी की,Aarti Kunj Bihari Ki,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥Shri Girdhar Krishna Murari Ki
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प्रश्न
'कुंजबिहारी' का क्या अर्थ है?
राधा और गोपियों के साथ वृंदावन के कुंजों में विहार करने वाले श्रीकृष्ण। कुंज यानी लताओं से घिरा फूलों भरा उपवन, और बिहारी यानी विहार करने वाले। वृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर का नाम भी इससे मिलता-जुलता है।
आरती कुंजबिहारी की कब गाई जाती है?
रोज़ सुबह-शाम की कृष्ण आरती में, और सबसे बढ़कर जन्माष्टमी की आधी रात को, जन्म के समय लड्डू गोपाल के अभिषेक के बाद। बहुत से परिवार बुधवार और एकादशी को भी इसे गाते हैं। आमतौर पर घी का दीया घुमाते हुए, घंटी, शंख और ताली के साथ गाते हैं।
आरती कुंजबिहारी की किसने लिखी?
रचयिता का पता नहीं है। भाषा ब्रज है, यानी मथुरा-वृंदावन की बोली, जिससे लगता है कि यह ब्रज की भक्ति-परंपरा से निकली। मंदिरों और आरती की किताबों से फैलने के कारण स्रोतों में कुछ शब्द अलग मिलते हैं। मुख्य पाठभेद हमारी स्रोत-टिप्पणी में हैं।
कृष्ण की आरती में गंगा का वर्णन क्यों है?
क्योंकि परंपरा के अनुसार गंगा भगवान के चरणों से निकलीं। जब भगवान ने वामन रूप में तीन पग में ब्रह्मांड नापा, तब उनके चरण से गंगा प्रकट हुईं, और धरती पर उतरते समय शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में थाम लिया। इसीलिए आरती श्रीकृष्ण के चरणों को गंगा का स्रोत मानकर उनकी वंदना करती है।
स्रोत और समीक्षा
स्रोत: Traditional Braj/Hindi aarti as printed in popular aarti-sangrah booklets; text cross-checked against BhaktiBharat.com, Drik Panchang (Hindi) and two further lyric collections (chantchalisa.com, hindibhajanlyrics.co.in)
Two lines differ between sources. Stanza 3: most sources and common singing read 'सकल मन हारिणि श्री गंगा'; Drik Panchang reads 'कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा' (remover of the sins of Kali Yuga), and some singers say 'सकल मल हारिणि'. Stanza 4: most read 'टेर सुन दीन दुखारी की'; Drik Panchang reads 'दीन भिखारी की'. We follow the majority. Line breaks within stanzas follow the sung phrasing; the refrain is repeated after each stanza.
मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।
ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।