Nityaनित्य
श्रीसूक्तम्
Shri Suktam
श्रीसूक्त देवी लक्ष्मी की सबसे प्राचीन स्तुति है: ऋग्वेद के खिल (परिशिष्ट) सूक्तों में आने वाले पंद्रह मंत्र। इसमें अग्निदेव से विनती है कि वे स्वर्णमयी, कभी न जाने वाली लक्ष्मी को घर में लाएँ और दरिद्रता को दूर करें। सोलहवाँ श्लोक, जो यहाँ दिया गया है, इन पंद्रह मंत्रों के नित्य जप की विधि बताता है; लक्ष्मी पूजन, शुक्रवार और दीपावली की रात इसका पाठ होता है।
मंत्र १
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
हे जातवेद अग्निदेव, स्वर्ण जैसे वर्ण वाली, दीप्तिमान, सोने और चाँदी की मालाएँ धारण करने वाली, चंद्रमा जैसी आह्लादकारी, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए।
मंत्र २
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥
हे जातवेद, उन लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए जो कभी दूर न जाएँ, जिनकी कृपा से मैं स्वर्ण, गौएँ, घोड़े और परिजन-सहायक प्राप्त करूँ।
मंत्र ३
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मादेवीर्जुषताम्॥
जिनके आगे घोड़े चलते हैं, जो रथों के बीच विराजती हैं और जिनके आगमन की सूचना हाथियों की चिंघाड़ देती है, उन श्री देवी का मैं आवाहन करता हूँ। श्री देवी मुझ पर प्रसन्न हों।
मंत्र ४
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥
जो स्वयं आनंद स्वरूप हैं, मंद मुस्कान वाली हैं, स्वर्ण के परकोटे में रहती हैं, करुणा से आर्द्र और प्रकाशमान हैं, स्वयं तृप्त हैं और सबको तृप्त करती हैं, कमल पर स्थित और कमल के रंग वाली हैं, उन श्री का मैं यहाँ आवाहन करता हूँ।
मंत्र ५
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥
चंद्रमा जैसी आह्लादकारी, प्रभा से युक्त, यश से दमकती, संसार में देवताओं द्वारा सेवित, उदार, कमल धारण करने वाली उन श्री की मैं शरण लेता हूँ। मेरी दरिद्रता नष्ट हो। मैं आपको वरण करता हूँ।
मंत्र ६
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥
हे सूर्य जैसी कांति वाली देवी, आपके तप से वनों का राजा बेल का वृक्ष उत्पन्न हुआ, जो आपका अपना वृक्ष है। उसके फल अपनी तपःशक्ति से मेरे भीतर के अज्ञान और बाहर की दरिद्रता को दूर करें।
मंत्र ७
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥
देवताओं के सखा कीर्ति और मणि के साथ मेरे पास आएँ। मैं इस देश में जन्मा हूँ; वे मुझे यश और समृद्धि प्रदान करें।
मंत्र ८
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥
भूख, प्यास और मलिनता रूपी ज्येष्ठा अलक्ष्मी को मैं नष्ट करता हूँ। हे देवी, सब प्रकार के अभाव और असमृद्धि को मेरे घर से निकाल दीजिए।
मंत्र ९
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥
जो सुगंध से पहचानी जाती हैं, जिन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता, जो सदा पुष्ट और पशुधन व उपज से समृद्ध हैं, जो सब प्राणियों की स्वामिनी हैं, उन श्री का मैं यहाँ आवाहन करता हूँ।
मंत्र १०
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥
हम मन की कामना, हृदय का संकल्प और वाणी की सत्यता प्राप्त करें। पशुओं और अन्न का सौंदर्य, श्री और यश मुझमें निवास करें।
मंत्र ११
कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥
हे कर्दम, आपके द्वारा लक्ष्मी संतान वाली हुईं। हे कर्दम, आप मुझमें प्रकट हों और कमल की माला धारण करने वाली माता श्री को मेरे कुल में बसाइए।
मंत्र १२
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥
जल स्निग्ध और पोषक वस्तुएँ उत्पन्न करें। हे चिक्लीत, मेरे घर में निवास कीजिए और देवी माता श्री को मेरे कुल में स्थायी रूप से बसाइए।
मंत्र १३
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
हे जातवेद, कृपा से आर्द्र, कमल-सरोवर वाली, पोषण स्वरूपा, सुनहरे वर्ण वाली, कमल की माला पहने, चंद्रमा जैसी आह्लादकारी, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए।
मंत्र १४
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
हे जातवेद, कृपा से आर्द्र, हाथ में राजदंड धारण करने वाली, सुंदर वर्ण वाली, सोने की माला पहने, सूर्य जैसी तेजस्वी, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए।
मंत्र १५
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान्विन्देयं पुरुषानहम्॥
हे जातवेद, उन लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए जो कभी दूर न जाएँ, जिनकी कृपा से मैं प्रचुर स्वर्ण, गौएँ, सेविकाएँ, घोड़े और परिजन प्राप्त करूँ।
फलश्रुति
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
श्रियः पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥
जो श्री की कामना करता है, वह पवित्र और संयमी होकर प्रतिदिन अग्नि में घी की आहुति दे और श्री की इन पंद्रह ऋचाओं का सदा जप करे।