श्रीसूक्तम्

Shri Suktam

श्रीसूक्त देवी लक्ष्मी की सबसे प्राचीन स्तुति है: ऋग्वेद के खिल (परिशिष्ट) सूक्तों में आने वाले पंद्रह मंत्र। इसमें अग्निदेव से विनती है कि वे स्वर्णमयी, कभी न जाने वाली लक्ष्मी को घर में लाएँ और दरिद्रता को दूर करें। सोलहवाँ श्लोक, जो यहाँ दिया गया है, इन पंद्रह मंत्रों के नित्य जप की विधि बताता है; लक्ष्मी पूजन, शुक्रवार और दीपावली की रात इसका पाठ होता है।

  • 16 पद
  • 6 मिनट
  • वैदिक (ऋग्वेद खिल); परंपरा में ऋषि आनंद, कर्दम, चिक्लीत और श्रीद बताए जाते हैं
  • उत्तम दिन: शुक्रवार

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हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।Hiranyavarnam Harinim Suvarna Rajata Srajam

चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥Chandram Hiranmayim Lakshmim Jatavedo Ma Avaha

हे जातवेद अग्निदेव, स्वर्ण जैसे वर्ण वाली, दीप्तिमान, सोने और चाँदी की मालाएँ धारण करने वाली, चंद्रमा जैसी आह्लादकारी, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए।

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।Tam Ma Avaha Jatavedo Lakshmim Anapagaminim

यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥Yasyam Hiranyam Vindeyam Gamashvam Purushanaham

हे जातवेद, उन लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए जो कभी दूर न जाएँ, जिनकी कृपा से मैं स्वर्ण, गौएँ, घोड़े और परिजन-सहायक प्राप्त करूँ।

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम्।Ashvapurvam Rathamadhyam Hastinada Prabodhinim

श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मादेवीर्जुषताम्॥Shriyam Devim Upahvaye Shrirma Devirjushatam

जिनके आगे घोड़े चलते हैं, जो रथों के बीच विराजती हैं और जिनके आगमन की सूचना हाथियों की चिंघाड़ देती है, उन श्री देवी का मैं आवाहन करता हूँ। श्री देवी मुझ पर प्रसन्न हों।

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।Kam Sosmitam Hiranya Prakaram Ardram Jvalantim Triptam Tarpayantim

पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥Padme Sthitam Padmavarnam Tamihopahvaye Shriyam

जो स्वयं आनंद स्वरूप हैं, मंद मुस्कान वाली हैं, स्वर्ण के परकोटे में रहती हैं, करुणा से आर्द्र और प्रकाशमान हैं, स्वयं तृप्त हैं और सबको तृप्त करती हैं, कमल पर स्थित और कमल के रंग वाली हैं, उन श्री का मैं यहाँ आवाहन करता हूँ।

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।Chandram Prabhasam Yashasa Jvalantim Shriyam Loke Devajushtam Udaram

तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥Tam Padminimim Sharanamaham Prapadye Alakshmirme Nashyatam Tvam Vrine

चंद्रमा जैसी आह्लादकारी, प्रभा से युक्त, यश से दमकती, संसार में देवताओं द्वारा सेवित, उदार, कमल धारण करने वाली उन श्री की मैं शरण लेता हूँ। मेरी दरिद्रता नष्ट हो। मैं आपको वरण करता हूँ।

आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।Adityavarne Tapasodhijato Vanaspatistava Vrikshotha Bilvah

तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥Tasya Phalani Tapasa Nudantu Mayantarayashcha Bahya Alakshmih

हे सूर्य जैसी कांति वाली देवी, आपके तप से वनों का राजा बेल का वृक्ष उत्पन्न हुआ, जो आपका अपना वृक्ष है। उसके फल अपनी तपःशक्ति से मेरे भीतर के अज्ञान और बाहर की दरिद्रता को दूर करें।

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।Upaitu Mam Devasakhah Kirtishcha Manina Saha

प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥Pradurbhutosmi Rashtresmin Kirtim Riddhim Dadatu Me

देवताओं के सखा कीर्ति और मणि के साथ मेरे पास आएँ। मैं इस देश में जन्मा हूँ; वे मुझे यश और समृद्धि प्रदान करें।

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।Kshutpipasamalam Jyeshtham Alakshmim Nashayamyaham

अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥Abhutim Asamriddhim Cha Sarvam Nirnuda Me Grihat

भूख, प्यास और मलिनता रूपी ज्येष्ठा अलक्ष्मी को मैं नष्ट करता हूँ। हे देवी, सब प्रकार के अभाव और असमृद्धि को मेरे घर से निकाल दीजिए।

गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।Gandhadvaram Duradharsham Nityapushtam Karishinim

ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥Ishvarim Sarvabhutanam Tamihopahvaye Shriyam

जो सुगंध से पहचानी जाती हैं, जिन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता, जो सदा पुष्ट और पशुधन व उपज से समृद्ध हैं, जो सब प्राणियों की स्वामिनी हैं, उन श्री का मैं यहाँ आवाहन करता हूँ।

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।Manasah Kamam Akutim Vachah Satyam Ashimahi

पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥Pashunam Rupamannasya Mayi Shrih Shrayatam Yashah

हम मन की कामना, हृदय का संकल्प और वाणी की सत्यता प्राप्त करें। पशुओं और अन्न का सौंदर्य, श्री और यश मुझमें निवास करें।

कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम।Kardamena Prajabhuta Mayi Sambhava Kardama

श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥Shriyam Vasaya Me Kule Mataram Padmamalinim

हे कर्दम, आपके द्वारा लक्ष्मी संतान वाली हुईं। हे कर्दम, आप मुझमें प्रकट हों और कमल की माला धारण करने वाली माता श्री को मेरे कुल में बसाइए।

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।Apah Srijantu Snigdhani Chiklita Vasa Me Grihe

नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥Ni Cha Devim Mataram Shriyam Vasaya Me Kule

जल स्निग्ध और पोषक वस्तुएँ उत्पन्न करें। हे चिक्लीत, मेरे घर में निवास कीजिए और देवी माता श्री को मेरे कुल में स्थायी रूप से बसाइए।

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।Ardram Pushkarinim Pushtim Pingalam Padmamalinim

चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥Chandram Hiranmayim Lakshmim Jatavedo Ma Avaha

हे जातवेद, कृपा से आर्द्र, कमल-सरोवर वाली, पोषण स्वरूपा, सुनहरे वर्ण वाली, कमल की माला पहने, चंद्रमा जैसी आह्लादकारी, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए।

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।Ardram Yah Karinim Yashtim Suvarnam Hemamalinim

सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥Suryam Hiranmayim Lakshmim Jatavedo Ma Avaha

हे जातवेद, कृपा से आर्द्र, हाथ में राजदंड धारण करने वाली, सुंदर वर्ण वाली, सोने की माला पहने, सूर्य जैसी तेजस्वी, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए।

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।Tam Ma Avaha Jatavedo Lakshmim Anapagaminim

यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान्विन्देयं पुरुषानहम्॥Yasyam Hiranyam Prabhutam Gavo Dasyoshvan Vindeyam Purushanaham

हे जातवेद, उन लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए जो कभी दूर न जाएँ, जिनकी कृपा से मैं प्रचुर स्वर्ण, गौएँ, सेविकाएँ, घोड़े और परिजन प्राप्त करूँ।

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।Yah Shuchih Prayato Bhutva Juhuyad Ajyam Anvaham

श्रियः पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥Shriyah Panchadasharcham Cha Shrikamah Satatam Japet

जो श्री की कामना करता है, वह पवित्र और संयमी होकर प्रतिदिन अग्नि में घी की आहुति दे और श्री की इन पंद्रह ऋचाओं का सदा जप करे।

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प्रश्न

श्रीसूक्त में कितने मंत्र हैं?

मूल वैदिक सूक्त पंद्रह मंत्रों का है। सोलहवाँ श्लोक "यः शुचिः प्रयतो भूत्वा" इन्हीं पंद्रह के नित्य पाठ की बात करता है, इसलिए वह फलश्रुति का श्लोक माना जाता है। दक्षिण भारत की पुस्तकें इसके बाद और श्लोक जोड़ती हैं, इसलिए कहीं १६, कहीं २२ या २९ की गिनती मिलती है।

क्या श्रीसूक्त ऋग्वेद का है?

यह ऋग्वेद के खिल सूक्तों में है, जो बाद में जोड़े गए और बाष्कल शाखा में सुरक्षित हैं। इसे प्रायः सूक्त ५.८७ के बाद रखा जाता है। भाषा पूरी तरह वैदिक और बहुत प्राचीन है, पर यह दस मंडलों वाली मूल संहिता का भाग नहीं है।

क्या दीपावली की रात लक्ष्मी पूजन के बाद श्रीसूक्त पढ़ सकते हैं?

हाँ, बहुत से परिवार पढ़ते हैं। परंपरा से इसे पूजन के आरंभ में पढ़ा जाता है, हर मंत्र पर देवी को जल, पुष्प या कुमकुम अर्पित करते हुए। आरती के बाद दीपक जलते रहते फिर से पढ़ना भी आम है।

क्या इसके लिए वैदिक स्वर जानना ज़रूरी है?

नहीं। घरों में अधिकतर लोग इसे स्वर के बिना पढ़ते हैं, जैसा इस पृष्ठ पर है, और परंपरा में भक्ति को पहला स्थान है। पुरोहितों की तरह उदात्त-अनुदात्त स्वरों के साथ पढ़ना हो तो किसी गुरु से सीखें।

स्रोत और समीक्षा

स्रोत: Shri Suktam (Rigvediya), sanskritdocuments.org s-sukta.itx and s-sukta-accent.itx (encoded and proofread by Avinash Sathaye, Shree, Anant Upadhyayula, Sunder Hattangadi); cross-checked line by line with "Prabhata Stotranidhi" (stotranidhi.com, Devanagari with svaras)

Mantras 1 to 15 are the Shri Sukta of the Rig Veda Khilani (Bashkala recension; appended after RV 5.87; Scheftelowitz, Die Apokryphen des Rgveda, 2.6). Verse 16 ("यः शुचिः प्रयतो भूत्वा") is the phala verse attached to it; it is not counted among the fifteen. Further appended verses ("पद्मानने पद्म ऊरू", "आनन्दः कर्दमः श्रीदश्चिक्लीत", the Lakshmi Gayatri and others), which both sources print after verse 16 in differing order, are left out. Vedic svara (accent) marks are omitted. The opening "ॐ" printed by sanskritdocuments.org is left out. Both sources agree word for word on mantras 1 to 16 once accents are removed. Spelling choices: "ईश्वरीं" for the sources' "ईश्वरीꣳ" / "ईश्वरीग्ं" (m9); "गन्धद्वारां" (stotranidhi) for "गंधद्वारां" (sanskritdocuments); "जुहुयादाज्यमन्वहम्" joined, where both sources print "जुहुयादाज्य मन्वहम्" (v16). Some traditions swap the half-lines "पिङ्गलां पद्ममालिनीम्" and "सुवर्णां हेममालिनीम्" between mantras 13 and 14 (with "चन्द्रां" and "सूर्यां"); both our sources have the order shown.

मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।

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