पाठ पर लौटें

यह पाठ प्रिंट करें

लिपि और विकल्प चुनें, फिर प्रिंट करें या PDF सहेजें।

Nityaनित्य

अहोई अष्टमी व्रत कथा

Ahoi Ashtami Vrat Katha

अहोई अष्टमी व्रत कथा वह कहानी है जो माताएँ अहोई अष्टमी पर पढ़ती हैं, जो करवा चौथ के कुछ दिन बाद संतान के लिए रखा जाने वाला व्रत है। इसमें एक साहूकारनी की कथा है, जिससे मिट्टी खोदते समय अनजाने में सेही का बच्चा मर गया, जिसने अपने सात बेटे खो दिए, और भूल मानकर व्रत रखने पर अहोई माता ने उसे उसके बेटे लौटा दिए। यह कथा शाम को, तारे देखकर व्रत खोलने से पहले पढ़ी जाती है।

अंश १

बहुत समय पहले एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसकी पत्नी के सात बेटे थे। घर धन-धान्य से भरा था और बच्चों की हँसी से गूँजता रहता था।

साहूकार की पत्नी और उसके सात बेटों का भरा-पूरा घर।

अंश २

दीवाली से कुछ दिन पहले साहूकारनी घर लीपने के लिए मिट्टी लाने जंगल की ओर गई। वहाँ एक टीले के पास वह कुदाल से मिट्टी खोदने लगी।

दीवाली से पहले साहूकारनी जंगल में टीले के पास मिट्टी खोदने गई।

अंश ३

उस टीले में एक सेही (स्याहु) की माँद थी, जिसमें उसके छोटे-छोटे बच्चे रहते थे। अनजाने में साहूकारनी की कुदाल एक बच्चे को लग गई और वह मर गया।

अनजाने में साहूकारनी की कुदाल से सेही का एक बच्चा मर गया।

अंश ४

यह देखकर साहूकारनी का मन काँप उठा। उसे अपनी भूल पर बहुत पछतावा हुआ। वह भारी मन से मिट्टी लेकर घर लौट आई, पर यह बात किसी से कह न सकी।

साहूकारनी को बहुत पछतावा हुआ, पर उसने यह बात किसी से नहीं कही।

अंश ५

कुछ समय बाद उसके बेटे एक-एक करके बीमार पड़ने लगे, और एक वर्ष के भीतर सातों बेटे चल बसे। साहूकारनी का दुख कहने से बाहर था। वह दिन-रात रोती रहती थी।

एक वर्ष के भीतर साहूकारनी के सातों बेटे चल बसे।

अंश ६

एक दिन उसने गाँव की बड़ी-बूढ़ी स्त्रियों के सामने अपना मन खोल दिया। उसने रोते हुए कहा, “मैंने जान-बूझकर कोई पाप नहीं किया। अनजाने में सेही का बच्चा मुझसे मर गया था। तभी से मेरा सब कुछ उजड़ गया।”

साहूकारनी ने गाँव की बुज़ुर्ग स्त्रियों को अपनी भूल बताई।

अंश ७

स्त्रियों ने उसे ढाढ़स बँधाया और कहा, “तुमने अपनी भूल सच्चे मन से मान ली है, इससे तुम्हारा आधा पाप धुल गया। अब कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता का व्रत रखो। दीवार पर सेही और उसके बच्चों का चित्र बनाकर अहोई माता की पूजा करो और अपनी भूल की क्षमा माँगो।”

स्त्रियों ने उसे कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता का व्रत और पूजा करने को कहा।

अंश ८

साहूकारनी ने वैसा ही किया। अष्टमी के दिन उसने सुबह से व्रत रखा। शाम को दीवार पर अहोई माता, सेही और उसके बच्चों का चित्र बनाया, जल से भरा करवा रखकर पूजा की और सच्चे मन से क्षमा माँगी। रात को तारे निकलने पर उसने तारों को अर्घ्य दिया और तब व्रत खोला। हर वर्ष वह यह व्रत इसी श्रद्धा से करती रही।

साहूकारनी ने अष्टमी को व्रत रखा, अहोई माता की पूजा की और तारे देखकर व्रत खोला।

अंश ९

अहोई माता उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हुईं। कहते हैं, उनकी कृपा से साहूकारनी के सातों बेटे उसे फिर मिल गए, और घर में फिर से खुशियाँ लौट आईं।

अहोई माता की कृपा से साहूकारनी को उसके सातों बेटे फिर मिल गए।

अंश १०

तभी से माताएँ अपनी संतान की लंबी आयु और सुख के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं। वे दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाकर पूजा करती हैं और तारे देखकर व्रत खोलती हैं।

तभी से माताएँ संतान के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं।

समापन प्रार्थना

हे अहोई माता, जैसे आपने साहूकारनी की सूनी गोद फिर भर दी, वैसे ही सबकी संतान की रक्षा करना और सबकी गोद हरी-भरी रखना। बोलो अहोई माता की जय!

अहोई माता से सबकी संतान की रक्षा की प्रार्थना।

स्रोत: Nitya's retelling of the traditional story (Hindi, 2026), written for this site; not a transcription of any printed edition

ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।

getnitya.com/hi/parvati/ahoi-ashtami-vrat-katha/