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Nityaनित्य

आरती साईबाबा

Aarti Sai Baba

आरती साईबाबा शिरडी साईं बाबा की वह आरती है जिसे ज़्यादातर लोग जानते हैं। इसे उनके भक्त माधवराव अडकर ने लगभग 1903 में मराठी में लिखा। इसमें एक टेक और सात छोटे पद हैं। शिरडी में यह दोपहर की मध्यान्ह आरती और सूर्यास्त की धूप आरती में गाई जाती है। देश-विदेश के घरों और साईं मंदिरों में इसे गुरुवार को गाते हैं, जिस दिन का ज़िक्र आरती में ही आता है।

टेक

आरती साईबाबा । सौख्यदातार जीवा ।

चरणरजातळीं द्यावा दासां विसावा, भक्तां विसावा ॥

हे साईबाबा, हर जीव को सुख देने वाले, हम आपकी आरती करते हैं। अपने चरणों की धूल तले अपने दासों को विश्राम दीजिए, भक्तों को विश्राम दीजिए।

पद १

जाळुनियां अनंग । स्वस्वरूपीं राहे दंग ।

मुमुक्षुजनां दावी । निज डोळां श्रीरंग ॥

कामना (अनंग) को जलाकर आप अपने आत्मस्वरूप में मग्न रहते हैं। मोक्ष चाहने वालों को आप उनकी अपनी आँखों से श्रीरंग (भगवान विष्णु) के दर्शन कराते हैं।

टेक

आरती साईबाबा । सौख्यदातार जीवा ।

चरणरजातळीं द्यावा दासां विसावा, भक्तां विसावा ॥

पद २

जया मनीं जैसा भाव । तया तैसा अनुभव ।

दाविसी दयाघना । ऐसी तुझी ही माव ॥

जिसके मन में जैसा भाव होता है, आप उसे वैसा ही अनुभव कराते हैं। हे दया के मेघ, यही आपकी रीत है।

टेक

आरती साईबाबा । सौख्यदातार जीवा ।

चरणरजातळीं द्यावा दासां विसावा, भक्तां विसावा ॥

पद ३

तुमचें नाम ध्यातां । हरे संसृतिव्यथा ।

अगाध तव करणी । मार्ग दाविसी अनाथा ॥

आपके नाम का ध्यान करते ही संसार का दुःख मिट जाता है। आपकी लीला अथाह है; आप अनाथों को राह दिखाते हैं।

टेक

आरती साईबाबा । सौख्यदातार जीवा ।

चरणरजातळीं द्यावा दासां विसावा, भक्तां विसावा ॥

पद ४

कलियुगीं अवतार । सगुणब्रह्म साचार ।

अवतीर्ण झालासे । स्वामी दत्त दिगंबर ॥

कलियुग में आप अवतार हैं, सचमुच सगुण ब्रह्म। आप स्वामी दत्त दिगंबर के रूप में अवतरित हुए हैं।

टेक

आरती साईबाबा । सौख्यदातार जीवा ।

चरणरजातळीं द्यावा दासां विसावा, भक्तां विसावा ॥

पद ५

आठां दिवसां गुरुवारीं । भक्त करिती वारी ।

प्रभुपद पहावया । भवभय निवारी ॥

हर हफ़्ते गुरुवार को भक्त प्रभु के चरणों के दर्शन के लिए यात्रा (वारी) करते हैं। आप उनका संसार का भय दूर करते हैं।

टेक

आरती साईबाबा । सौख्यदातार जीवा ।

चरणरजातळीं द्यावा दासां विसावा, भक्तां विसावा ॥

पद ६

माझा निजद्रव्यठेवा । तव चरणरजसेवा ।

मागणें हेंचि आतां । तुम्हां देवाधिदेवा ॥

मेरी अपनी असली पूँजी आपके चरणों की धूल की सेवा है। हे देवों के देव, अब आपसे बस यही माँगता हूँ।

टेक

आरती साईबाबा । सौख्यदातार जीवा ।

चरणरजातळीं द्यावा दासां विसावा, भक्तां विसावा ॥

पद ७

इच्छित दीन चातक । निर्मळ तोय निजसुख ।

पाजावें माधवा या । सांभाळ आपुली भाक ॥

जैसे दीन चातक वर्षा की बूँद को तरसता है, वैसे ही मैं आत्मसुख के निर्मल जल की इच्छा करता हूँ। इस माधव को वह जल पिलाइए, और अपना दिया वचन निभाइए।

टेक

आरती साईबाबा । सौख्यदातार जीवा ।

चरणरजातळीं द्यावा दासां विसावा, भक्तां विसावा ॥

स्रोत: Marathi aarti by Madhavrao Vamanrao Adkar, as sung in the Shirdi Madhyan and Dhoop aartis. Devanagari collated from sites.google.com/site/vaibhavbirit (Madhyan aarti, word by word), aajtak.in (Shri Shirdi Sai Baba Dhoop Aarti) and marathi.webdunia.com (two pages), with bharatdiscovery.org; Roman checked against the aarti book of the Sri Shirdi Sai Baba Temple of Austin

ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।

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