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Nityaनित्य
शेज आरती: जय जय साईनाथ
Shej Aarti: Jai Jai Sainath
"जय जय साईनाथ" शेज आरती का मुख्य भजन है, वह रात की आरती जिससे शिरडी का दिन पूरा होता है। के. जे. भीष्म के लिखे इस मराठी भजन में एक टेक और तीन पद हैं। इनमें बाबा से विश्राम करने की विनती है, भक्तों के कष्ट उठाने के लिए उनका आभार है, और सुबह फिर आने का वचन है। शिरडी में यह रात 10 बजे और बहुत से साईं मंदिरों में दिन की अंतिम आरती में गाया जाता है।
टेक
जय जय साईनाथ आतां पहुडावें मंदिरीं हो ।
आळवितों सप्रेमें तुजला आरति घेउनि करीं हो ॥
जय हो, जय हो साईनाथ! अब आप मंदिर में विश्राम कीजिए। हाथों में आरती लेकर हम प्रेम से आपको पुकारते हैं।
पद १
रंजविसी तूं मधुर बोलुनी माय जशी निज मुला हो ।
भोगिसि व्याधी तूंच हरुनियां निजसेवकदुःखाला हो ।
धांवुनि भक्तव्यसन हरिसी दर्शन देसी त्याला हो ।
झाले असतील कष्ट अतिशय तुमचे या देहाला हो ॥
जैसे माँ अपने बच्चे को मीठे बोलों से बहलाती है, वैसे ही आप हमें बहलाते हैं। अपने सेवकों का दुःख हरकर उनकी व्याधि आप स्वयं भोगते हैं। दौड़कर भक्त का संकट हरते हैं और उसे दर्शन देते हैं। आपकी इस देह को बहुत कष्ट हुआ होगा।
टेक
जय जय साईनाथ आतां पहुडावें मंदिरीं हो ।
आळवितों सप्रेमें तुजला आरति घेउनि करीं हो ॥
पद २
क्षमा शयन सुंदर ही शोभा सुमनशेज त्यावरी हो ।
घ्यावी थोडी भक्तजनांची पूजनादि चाकरी हो ।
ओंवाळीतों पंचप्राण ज्योति सुमती करीं हो ।
सेवा किंकर भक्त प्रीती अत्तर परिमळ वारी हो ॥
हमें क्षमा कीजिए और शयन कीजिए; उस पर बिछी फूलों की सेज कितनी सुंदर लग रही है। भक्तों की पूजा आदि की थोड़ी सी सेवा स्वीकार कीजिए। निर्मल बुद्धि की ज्योति हाथ में लेकर हम पंचप्राणों से आपकी आरती उतारते हैं। आपके सेवक भक्त प्रेम से इत्र और सुगंधित जल अर्पित करते हैं।
टेक
जय जय साईनाथ आतां पहुडावें मंदिरीं हो ।
आळवितों सप्रेमें तुजला आरति घेउनि करीं हो ॥
पद ३
सोडुनि जाया दुःख वाटतें साई त्वच्चरणांसी हो ।
आज्ञेस्तव हा आशीरप्रसाद घेउनि निजसदनासी हो ।
जातों आतां येऊं पुनरपि त्वच्चरणाचे पाशीं हो ।
उठवूं तुजला साईमाउले निजहित साधायासी हो ॥
हे साईं, आपके चरण छोड़कर जाने में दुःख होता है। आपकी आज्ञा से यह आशीर्वाद और प्रसाद लेकर हम अपने घर जाते हैं। अब जाते हैं, फिर आपके चरणों के पास लौट आएँगे। हे साईं माउली, अपने हित के लिए हम आपको जगाने आएँगे।
टेक
जय जय साईनाथ आतां पहुडावें मंदिरीं हो ।
आळवितों सप्रेमें तुजला आरति घेउनि करीं हो ॥