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Nityaनित्य

श्री शिव चालीसा

Shiv Chalisa

श्री शिव चालीसा भगवान शिव की पारंपरिक हिंदी स्तुति है, जिसके कवि ने अपना नाम अयोध्यादास दिया है। इसके ४४ पदों (गणेश जी को समर्पित आरंभ का दोहा, ४१ चौपाइयाँ और अंत के दो दोहे) में पार्वती, गणेश और कार्तिकेय के साथ शिव जी का वर्णन है, समुद्र-मंथन का विष पीने और श्रीराम व विष्णु जी पर कृपा की कथाएँ हैं, और उनसे रक्षा की प्रार्थना है। इसका पाठ सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि पर होता है।

आरंभ दोहा

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।

कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

हे गिरिजा के पुत्र, सब मंगलों के मूल, ज्ञानी गणेश जी, आपकी जय हो। अयोध्यादास कहते हैं: मुझे अभय का वरदान दीजिए।

चौपाई १

जय गिरिजा पति दीन दयाला।

सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥

गिरिजा के पति, दीनों पर दया करने वाले शिव जी की जय हो, जो सदा संतों की रक्षा करते हैं।

चौपाई २

भाल चन्द्रमा सोहत नीके।

कानन कुण्डल नागफनी के॥

माथे पर चंद्रमा सुंदर शोभा पाता है और कानों में नाग के फनों के कुंडल हैं।

चौपाई ३

अंग गौर शिर गंग बहाये।

मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥

आपका शरीर गोरा है और सिर से गंगा बहती है। आप मुंडों की माला पहनते हैं और शरीर पर भस्म लगाते हैं।

चौपाई ४

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।

छवि को देखि नाग मन मोहे॥

बाघ की खाल आपका वस्त्र है, और आपकी छवि देखकर नागों का भी मन मोहित हो जाता है।

चौपाई ५

मैना मातु की हवे दुलारी।

बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

माता मैना की लाडली (पार्वती जी) आपके बाएँ अंग में विराजती हैं; यह छवि अनोखी है।

चौपाई ६

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।

करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

हाथ में त्रिशूल की छवि बड़ी भव्य लगती है, जो सदा शत्रुओं का नाश करता है।

चौपाई ७

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे।

सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

वहाँ नंदी और गणेश जी ऐसे शोभा पाते हैं, जैसे सरोवर के बीच कमल।

चौपाई ८

कार्तिक श्याम और गणराऊ।

या छवि को कहि जात न काऊ॥

कार्तिकेय, श्यामा और गणों के स्वामी: इस छवि का वर्णन कोई नहीं कर सकता।

चौपाई ९

देवन जबहीं जाय पुकारा।

तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥

जब-जब देवताओं ने जाकर पुकारा, तब-तब प्रभु, आपने स्वयं उनका दुख दूर किया।

चौपाई १०

किया उपद्रव तारक भारी।

देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

जब तारकासुर ने भारी उपद्रव मचाया, तो सब देवताओं ने मिलकर आपसे विनती की।

चौपाई ११

तुरत षडानन आप पठायउ।

लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥

आपने तुरंत छह मुख वाले कार्तिकेय को भेजा, जिन्होंने पलक झपकते ही उसे मार गिराया।

चौपाई १२

आप जलंधर असुर संहारा।

सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

आपने स्वयं जलंधर असुर का संहार किया; आपका सुयश सारे संसार में प्रसिद्ध है।

चौपाई १३

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।

सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥

आपने त्रिपुरासुर से युद्ध किया और कृपा करके सबको बचा लिया।

चौपाई १४

किया तपहिं भागीरथ भारी।

पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥

जब भगीरथ ने भारी तप किया, तब हे पुरारि, आपने उनकी प्रतिज्ञा पूरी की।

चौपाई १५

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं।

सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

दानियों में आपके समान कोई नहीं है; सेवक सदा आपकी स्तुति करते हैं।

चौपाई १६

वेद माहि महिमा तुम गाई।

अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

वेदों में आपकी महिमा गाई गई है, पर आप अकथ और अनादि हैं; आपका भेद कोई नहीं पा सका।

चौपाई १७

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला।

जरत सुरासुर भए विहाला॥

समुद्र-मंथन में विष की ज्वाला प्रकट हुई, जिसमें जलते हुए देवता और असुर बेहाल हो गए।

चौपाई १८

कीन्ही दया तहं करी सहाई।

नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

आपने दया करके वहाँ सहायता की (विष पीकर), और तभी से आपका नाम नीलकंठ पड़ा।

चौपाई १९

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा।

जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥

जब श्रीरामचंद्र ने आपका पूजन किया, तो उन्होंने लंका जीतकर विभीषण को दे दी।

चौपाई २०

सहस कमल में हो रहे धारी।

कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

जब (विष्णु जी) सहस्र कमलों से पूजा कर रहे थे, तब पुरारि ने उनकी परीक्षा ली।

चौपाई २१

एक कमल प्रभु राखेउ जोई।

कमल नयन पूजन चहं सोई॥

प्रभु ने एक कमल छिपा लिया, तो कमलनयन (विष्णु) अपने नेत्र से ही पूजा करना चाहने लगे।

चौपाई २२

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।

भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

ऐसी कठिन भक्ति देखकर प्रभु शंकर प्रसन्न हुए और मनचाहा वर दिया।

चौपाई २३

जय जय जय अनन्त अविनाशी।

करत कृपा सब के घटवासी॥

हे अनंत, अविनाशी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप सबके हृदय में बसते हैं और सब पर कृपा करते हैं।

चौपाई २४

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।

भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥

सारे दुष्ट मुझे रोज़ सताते हैं; मैं भटकता रहता हूँ और मुझे चैन नहीं मिलता।

चौपाई २५

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।

येहि अवसर मोहि आन उबारो॥

हे नाथ, मैं "त्राहि त्राहि" पुकार रहा हूँ। इसी समय आकर मुझे उबार लीजिए।

चौपाई २६

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।

संकट से मोहि आन उबारो॥

त्रिशूल लेकर शत्रुओं को मारिए और आकर मुझे संकट से उबारिए।

चौपाई २७

मात-पिता भ्राता सब होई।

संकट में पूछत नहिं कोई॥

माता, पिता, भाई सब होते हैं, पर संकट में कोई नहीं पूछता।

चौपाई २८

स्वामी एक है आस तुम्हारी।

आय हरहु मम संकट भारी॥

हे स्वामी, एक आपकी ही आस है। आकर मेरा भारी संकट हर लीजिए।

चौपाई २९

धन निर्धन को देत सदा हीं।

जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥

आप सदा निर्धन को धन देते हैं; जो भी आपसे माँगता है, वह फल पाता है।

चौपाई ३०

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी।

क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

हम किस विधि से आपकी स्तुति करें? हे नाथ, अब हमारी भूलें क्षमा कीजिए।

चौपाई ३१

शंकर हो संकट के नाशन।

मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

हे शंकर, आप संकटों का नाश करने वाले, मंगल के कारण और विघ्नों का विनाश करने वाले हैं।

चौपाई ३२

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।

शारद नारद शीश नवावैं॥

योगी, यति और मुनि आपका ध्यान करते हैं; शारदा और नारद आपको शीश नवाते हैं।

चौपाई ३३

नमो नमो जय नमः शिवाय।

सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥

नमो नमो, जय हो, शिव जी को नमस्कार। ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पार नहीं पा सके।

चौपाई ३४

जो यह पाठ करे मन लाई।

ता पर होत है शम्भु सहाई॥

जो मन लगाकर इसका पाठ करता है, शम्भु उसकी सहायता करते हैं।

चौपाई ३५

ऋनियां जो कोई हो अधिकारी।

पाठ करे सो पावन हारी॥

जो कोई ऋण से दबा हो, वह इसका पाठ करे तो ऋण से मुक्त हो जाता है।

चौपाई ३६

पुत्र होन कर इच्छा जोई।

निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

जिसे पुत्र होने की इच्छा हो, उसे निश्चय ही शिव जी का प्रसाद मिलता है।

चौपाई ३७

पण्डित त्रयोदशी को लावे।

ध्यान पूर्वक होम करावे॥

त्रयोदशी को पंडित को बुलाकर ध्यानपूर्वक हवन कराए।

चौपाई ३८

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा।

ताके तन नहीं रहै कलेशा॥

जो हमेशा त्रयोदशी का व्रत करता है, उसके शरीर में कोई क्लेश नहीं रहता।

चौपाई ३९

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।

शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥

धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाकर शंकर जी के सामने यह पाठ सुनाए।

चौपाई ४०

जन्म जन्म के पाप नसावे।

अन्त धाम शिवपुर में पावे॥

जन्म-जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में शिवलोक में स्थान मिलता है।

चौपाई ४१

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी।

जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

अयोध्यादास कहते हैं: मुझे आपकी ही आस है। आप सब जानते हैं; हमारे सारे दुख हर लीजिए।

समापन दोहा १

नित्त नेम उठि प्रातः ही, पाठ करो चालीस।

तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥

नियम से रोज़ सुबह उठकर मैं यह चालीसा पढ़ता हूँ। हे जगदीश, मेरी मनोकामना पूरी कीजिए।

समापन दोहा २

मगसर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान।

अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

जानिए कि मार्गशीर्ष की षष्ठी को, हेमंत ऋतु में, संवत चौंसठ में, शिव जी की यह स्तुति-चालीसा कल्याण के लिए पूरी हुई।

स्रोत: Traditional Hindi text, cross-checked line by line against sanskritdocuments.org (doc_z_otherlang_hindi/siva40), Bharat Discovery / Bharatkosh (शिव चालीसा), BhaktiBharat.com (chalisa/shiv-chalisa) and AstroVed (hindi/blog/shiv-chalisa)

ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।

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