श्री शिव चालीसा

Shiv Chalisa

श्री शिव चालीसा भगवान शिव की पारंपरिक हिंदी स्तुति है, जिसके कवि ने अपना नाम अयोध्यादास दिया है। इसके ४४ पदों (गणेश जी को समर्पित आरंभ का दोहा, ४१ चौपाइयाँ और अंत के दो दोहे) में पार्वती, गणेश और कार्तिकेय के साथ शिव जी का वर्णन है, समुद्र-मंथन का विष पीने और श्रीराम व विष्णु जी पर कृपा की कथाएँ हैं, और उनसे रक्षा की प्रार्थना है। इसका पाठ सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि पर होता है।

  • 44 पद
  • 8 मिनट
  • अयोध्यादास (पाठ में नाम)
  • उत्तम दिन: सोमवार

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जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।Jai Ganesh Girija Suvan, Mangal Mool Sujan

कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥Kahat Ayodhyadas Tum, Dehu Abhay Vardan

हे गिरिजा के पुत्र, सब मंगलों के मूल, ज्ञानी गणेश जी, आपकी जय हो। अयोध्यादास कहते हैं: मुझे अभय का वरदान दीजिए।

जय गिरिजा पति दीन दयाला।Jai Girija Pati Deen Dayala

सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥Sada Karat Santan Pratipala

गिरिजा के पति, दीनों पर दया करने वाले शिव जी की जय हो, जो सदा संतों की रक्षा करते हैं।

भाल चन्द्रमा सोहत नीके।Bhal Chandrama Sohat Neeke

कानन कुण्डल नागफनी के॥Kanan Kundal Nagphani Ke

माथे पर चंद्रमा सुंदर शोभा पाता है और कानों में नाग के फनों के कुंडल हैं।

अंग गौर शिर गंग बहाये।Ang Gaur Shir Gang Bahaye

मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥Mundmal Tan Kshar Lagaye

आपका शरीर गोरा है और सिर से गंगा बहती है। आप मुंडों की माला पहनते हैं और शरीर पर भस्म लगाते हैं।

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।Vastra Khal Baghambar Sohe

छवि को देखि नाग मन मोहे॥Chhavi Ko Dekhi Nag Man Mohe

बाघ की खाल आपका वस्त्र है, और आपकी छवि देखकर नागों का भी मन मोहित हो जाता है।

मैना मातु की हवे दुलारी।Maina Matu Ki Have Dulari

बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥Bam Ang Sohat Chhavi Nyari

माता मैना की लाडली (पार्वती जी) आपके बाएँ अंग में विराजती हैं; यह छवि अनोखी है।

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।Kar Trishul Sohat Chhavi Bhari

करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥Karat Sada Shatrun Kshaykari

हाथ में त्रिशूल की छवि बड़ी भव्य लगती है, जो सदा शत्रुओं का नाश करता है।

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे।Nandi Ganesh Sohai Tahan Kaise

सागर मध्य कमल हैं जैसे॥Sagar Madhya Kamal Hain Jaise

वहाँ नंदी और गणेश जी ऐसे शोभा पाते हैं, जैसे सरोवर के बीच कमल।

कार्तिक श्याम और गणराऊ।Kartik Shyam Aur Ganrau

या छवि को कहि जात न काऊ॥Ya Chhavi Ko Kahi Jat Na Kau

कार्तिकेय, श्यामा और गणों के स्वामी: इस छवि का वर्णन कोई नहीं कर सकता।

देवन जबहीं जाय पुकारा।Devan Jabahin Jay Pukara

तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥Tab Hi Dukh Prabhu Aap Nivara

जब-जब देवताओं ने जाकर पुकारा, तब-तब प्रभु, आपने स्वयं उनका दुख दूर किया।

किया उपद्रव तारक भारी।Kiya Upadrav Tarak Bhari

देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥Devan Sab Mili Tumahin Juhari

जब तारकासुर ने भारी उपद्रव मचाया, तो सब देवताओं ने मिलकर आपसे विनती की।

तुरत षडानन आप पठायउ।Turat Shadanan Aap Pathayau

लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥Lavnimesh Mahan Mari Girayau

आपने तुरंत छह मुख वाले कार्तिकेय को भेजा, जिन्होंने पलक झपकते ही उसे मार गिराया।

आप जलंधर असुर संहारा।Aap Jalandhar Asur Samhara

सुयश तुम्हार विदित संसारा॥Suyash Tumhar Vidit Sansara

आपने स्वयं जलंधर असुर का संहार किया; आपका सुयश सारे संसार में प्रसिद्ध है।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।Tripurasur San Yuddh Machai

सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥Sabahin Kripa Kar Leen Bachai

आपने त्रिपुरासुर से युद्ध किया और कृपा करके सबको बचा लिया।

किया तपहिं भागीरथ भारी।Kiya Tapahin Bhagirath Bhari

पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥Purab Pratigya Tasu Purari

जब भगीरथ ने भारी तप किया, तब हे पुरारि, आपने उनकी प्रतिज्ञा पूरी की।

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं।Danin Mahan Tum Sam Kou Nahin

सेवक स्तुति करत सदाहीं॥Sevak Stuti Karat Sadahin

दानियों में आपके समान कोई नहीं है; सेवक सदा आपकी स्तुति करते हैं।

वेद माहि महिमा तुम गाई।Ved Mahi Mahima Tum Gai

अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥Akath Anadi Bhed Nahin Pai

वेदों में आपकी महिमा गाई गई है, पर आप अकथ और अनादि हैं; आपका भेद कोई नहीं पा सका।

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला।Prakati Udadhi Manthan Mein Jwala

जरत सुरासुर भए विहाला॥Jarat Surasur Bhaye Vihala

समुद्र-मंथन में विष की ज्वाला प्रकट हुई, जिसमें जलते हुए देवता और असुर बेहाल हो गए।

कीन्ही दया तहं करी सहाई।Keenhi Daya Tahan Kari Sahai

नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥Neelkanth Tab Naam Kahai

आपने दया करके वहाँ सहायता की (विष पीकर), और तभी से आपका नाम नीलकंठ पड़ा।

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा।Poojan Ramchandra Jab Keenha

जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥Jeet Ke Lank Vibhishan Deenha

जब श्रीरामचंद्र ने आपका पूजन किया, तो उन्होंने लंका जीतकर विभीषण को दे दी।

सहस कमल में हो रहे धारी।Sahas Kamal Mein Ho Rahe Dhari

कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥Keenh Pariksha Tabahin Purari

जब (विष्णु जी) सहस्र कमलों से पूजा कर रहे थे, तब पुरारि ने उनकी परीक्षा ली।

एक कमल प्रभु राखेउ जोई।Ek Kamal Prabhu Rakheu Joi

कमल नयन पूजन चहं सोई॥Kamal Nayan Poojan Chahan Soi

प्रभु ने एक कमल छिपा लिया, तो कमलनयन (विष्णु) अपने नेत्र से ही पूजा करना चाहने लगे।

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।Kathin Bhakti Dekhi Prabhu Shankar

भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥Bhaye Prasanna Diye Ichchhit Var

ऐसी कठिन भक्ति देखकर प्रभु शंकर प्रसन्न हुए और मनचाहा वर दिया।

जय जय जय अनन्त अविनाशी।Jai Jai Jai Anant Avinashi

करत कृपा सब के घटवासी॥Karat Kripa Sab Ke Ghatvasi

हे अनंत, अविनाशी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप सबके हृदय में बसते हैं और सब पर कृपा करते हैं।

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।Dusht Sakal Nit Mohi Satavai

भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥Bhramat Rahaun Mohi Chain Na Avai

सारे दुष्ट मुझे रोज़ सताते हैं; मैं भटकता रहता हूँ और मुझे चैन नहीं मिलता।

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।Trahi Trahi Main Nath Pukaro

येहि अवसर मोहि आन उबारो॥Yehi Avasar Mohi Aan Ubaro

हे नाथ, मैं "त्राहि त्राहि" पुकार रहा हूँ। इसी समय आकर मुझे उबार लीजिए।

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।Lai Trishul Shatrun Ko Maro

संकट से मोहि आन उबारो॥Sankat Se Mohi Aan Ubaro

त्रिशूल लेकर शत्रुओं को मारिए और आकर मुझे संकट से उबारिए।

मात-पिता भ्राता सब होई।Mat Pita Bhrata Sab Hoi

संकट में पूछत नहिं कोई॥Sankat Mein Poochhat Nahin Koi

माता, पिता, भाई सब होते हैं, पर संकट में कोई नहीं पूछता।

स्वामी एक है आस तुम्हारी।Swami Ek Hai Aas Tumhari

आय हरहु मम संकट भारी॥Aay Harahu Mam Sankat Bhari

हे स्वामी, एक आपकी ही आस है। आकर मेरा भारी संकट हर लीजिए।

धन निर्धन को देत सदा हीं।Dhan Nirdhan Ko Det Sada Hin

जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥Jo Koi Janche So Phal Pahin

आप सदा निर्धन को धन देते हैं; जो भी आपसे माँगता है, वह फल पाता है।

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी।Astuti Kehi Vidhi Karain Tumhari

क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥Kshamahu Nath Ab Chook Hamari

हम किस विधि से आपकी स्तुति करें? हे नाथ, अब हमारी भूलें क्षमा कीजिए।

शंकर हो संकट के नाशन।Shankar Ho Sankat Ke Nashan

मंगल कारण विघ्न विनाशन॥Mangal Karan Vighna Vinashan

हे शंकर, आप संकटों का नाश करने वाले, मंगल के कारण और विघ्नों का विनाश करने वाले हैं।

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।Yogi Yati Muni Dhyan Lagavain

शारद नारद शीश नवावैं॥Sharad Narad Sheesh Navavain

योगी, यति और मुनि आपका ध्यान करते हैं; शारदा और नारद आपको शीश नवाते हैं।

नमो नमो जय नमः शिवाय।Namo Namo Jai Namah Shivaya

सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥Sur Brahmadik Par Na Paay

नमो नमो, जय हो, शिव जी को नमस्कार। ब्रह्मा आदि देवता भी आपका पार नहीं पा सके।

जो यह पाठ करे मन लाई।Jo Yah Path Kare Man Lai

ता पर होत है शम्भु सहाई॥Ta Par Hot Hai Shambhu Sahai

जो मन लगाकर इसका पाठ करता है, शम्भु उसकी सहायता करते हैं।

ऋनियां जो कोई हो अधिकारी।Riniyan Jo Koi Ho Adhikari

पाठ करे सो पावन हारी॥Path Kare So Pavan Hari

जो कोई ऋण से दबा हो, वह इसका पाठ करे तो ऋण से मुक्त हो जाता है।

पुत्र होन कर इच्छा जोई।Putra Hon Kar Ichchha Joi

निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥Nishchay Shiv Prasad Tehi Hoi

जिसे पुत्र होने की इच्छा हो, उसे निश्चय ही शिव जी का प्रसाद मिलता है।

पण्डित त्रयोदशी को लावे।Pandit Trayodashi Ko Lave

ध्यान पूर्वक होम करावे॥Dhyan Poorvak Hom Karave

त्रयोदशी को पंडित को बुलाकर ध्यानपूर्वक हवन कराए।

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा।Trayodashi Vrat Karai Hamesha

ताके तन नहीं रहै कलेशा॥Take Tan Nahin Rahai Kalesha

जो हमेशा त्रयोदशी का व्रत करता है, उसके शरीर में कोई क्लेश नहीं रहता।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।Dhoop Deep Naivedya Chadhave

शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥Shankar Sammukh Path Sunave

धूप, दीप और नैवेद्य चढ़ाकर शंकर जी के सामने यह पाठ सुनाए।

जन्म जन्म के पाप नसावे।Janam Janam Ke Paap Nasave

अन्त धाम शिवपुर में पावे॥Ant Dham Shivpur Mein Pave

जन्म-जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में शिवलोक में स्थान मिलता है।

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी।Kahain Ayodhyadas Aas Tumhari

जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥Jani Sakal Dukh Harahu Hamari

अयोध्यादास कहते हैं: मुझे आपकी ही आस है। आप सब जानते हैं; हमारे सारे दुख हर लीजिए।

नित्त नेम उठि प्रातः ही, पाठ करो चालीस।Nitt Nem Uthi Pratah Hi, Path Karo Chalis

तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥Tum Meri Manokamana, Poorn Karo Jagdish

नियम से रोज़ सुबह उठकर मैं यह चालीसा पढ़ता हूँ। हे जगदीश, मेरी मनोकामना पूरी कीजिए।

मगसर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान।Magsar Chhathi Hemant Ritu, Samvat Chausath Jan

अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥Astuti Chalisa Shivahi, Poorn Keen Kalyan

जानिए कि मार्गशीर्ष की षष्ठी को, हेमंत ऋतु में, संवत चौंसठ में, शिव जी की यह स्तुति-चालीसा कल्याण के लिए पूरी हुई।

पूर्ण

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प्रश्न

शिव चालीसा का पाठ कब करें?

सोमवार शिव जी का दिन है, इसलिए बहुत लोग हर सोमवार इसका पाठ करते हैं। प्रदोष (त्रयोदशी), पूरे सावन और महाशिवरात्रि पर भी इसे पढ़ते हैं, अक्सर शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाते हुए।

शिव चालीसा किसने लिखी?

कवि ने आरंभ के दोहे और अंतिम चौपाई में अपना नाम अयोध्यादास दिया है। उनके बारे में भरोसेमंद जानकारी नहीं है। एक समापन दोहे में तिथि दी है, मार्गशीर्ष की षष्ठी, "संवत चौसठ", पर शताब्दी नहीं बताई गई।

शिव चालीसा गणेश जी से क्यों शुरू होती है?

किसी भी पूजा या पाठ से पहले गणेश जी का स्मरण होता है, और वे शिव जी के पुत्र भी हैं। इसलिए पहला दोहा उन्हें गिरिजा-पुत्र कहकर नमन करता है और अभय माँगता है, फिर शिव-स्तुति शुरू होती है।

क्या शाम को पाठ कर सकते हैं?

हाँ। समापन दोहे में सुबह का उल्लेख है, पर शाम, ख़ासकर सूर्यास्त के आसपास प्रदोष काल, भी शिव-पूजन का पारंपरिक समय है।

पाठ में कितना समय लगता है?

आराम से पढ़ें तो लगभग आठ मिनट।

स्रोत और समीक्षा

स्रोत: Traditional Hindi text, cross-checked line by line against sanskritdocuments.org (doc_z_otherlang_hindi/siva40), Bharat Discovery / Bharatkosh (शिव चालीसा), BhaktiBharat.com (chalisa/shiv-chalisa) and AstroVed (hindi/blog/shiv-chalisa)

The sources fall into two families: sanskritdocuments.org and Bharat Discovery share one text (one closing doha); BhaktiBharat and AstroVed share the popular sung text with two closing dohas. We follow the BhaktiBharat/AstroVed text, the one most people recite, and take readings from the other family where it is supported by three of the four sources: "वेद माहि महिमा तुम गाई" (ch. 16, BhaktiBharat 'वेद नाम महिमा तव गाई') and "पुत्र होन" (ch. 36, AstroVed and sanskritdocuments; BhaktiBharat 'पुत्र हीन'). Other variants are listed in the verse notes: देउ/देहु (doha 1), कि/की, वाम/बाम (ch. 5), तबहिं/सबहिं (ch. 13), त्रिपुरारी/पुरारी (ch. 20), सब कोई/सब होई (ch. 27), रनियां/ॠनियां (ch. 35; we print ऋनियां), and the closing dohas. Not yet compared with a Gita Press printing.

मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।

ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।

त्रुटि बताएँ अंतिम अद्यतन 2026-10-04

मुख्य तथ्य

रचयिता
अयोध्यादास (पाठ में नाम)
श्लोक / पद
44
मूल भाषा
हिन्दी
स्रोत संस्करण
Traditional Hindi text, cross-checked line by line against sanskritdocuments.org (doc_z_otherlang_hindi/siva40), Bharat Discovery / Bharatkosh (शिव चालीसा), BhaktiBharat.com (chalisa/shiv-chalisa) and AstroVed (hindi/blog/shiv-chalisa)
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समीक्षा की स्थिति
लिपि सत्यापित

इस पन्ने का संदर्भ दें

“श्री शिव चालीसा”. Nitya, अद्यतन 2026-10-04. https://getnitya.com/hi/shiva/shiv-chalisa/

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