पाठ पर लौटें

यह पाठ प्रिंट करें

लिपि और विकल्प चुनें, फिर प्रिंट करें या PDF सहेजें।

Nityaनित्य

ॐ जय जगदीश हरे

Om Jai Jagdish Hare

ॐ जय जगदीश हरे सबसे प्रसिद्ध हिंदू आरतियों में से एक है। यह भगवान विष्णु को "जगदीश" यानी जगत के स्वामी कहकर गाया जाने वाला हिंदी भजन है, जिसे पंजाब के पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी ने लगभग १८७० में रचा। इसमें एक टेक और सात पद हैं, जिनमें दुःख दूर करने, दोष क्षमा करने और श्रद्धा बढ़ाने की प्रार्थना है। भारत और विदेशों में बहुत से परिवार अपनी पूजा और सत्यनारायण कथा इसी आरती से पूरी करते हैं।

टेक

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,

क्षण में दूर करे॥

ॐ, हे जगत के स्वामी हरि, आपकी जय हो! हे स्वामी, आपकी जय हो। आप अपने भक्तों और सेवकों के संकट क्षण भर में दूर कर देते हैं।

पद १

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।

स्वामी दुःख बिनसे मन का।

सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥

जो आपका ध्यान करता है उसे फल मिलता है और उसके मन का दुःख नष्ट हो जाता है। उसके घर सुख-सम्पत्ति आती है और तन का कष्ट मिट जाता है।

टेक

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,

क्षण में दूर करे॥

पद २

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।

स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।

तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥

आप ही मेरे माता-पिता हैं, मैं और किसकी शरण लूँ? आपके बिना दूसरा कोई नहीं, जिससे मैं आशा रखूँ।

टेक

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,

क्षण में दूर करे॥

पद ३

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।

स्वामी तुम अन्तर्यामी।

पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥

आप पूर्ण परमात्मा हैं, आप सबके हृदय की जानने वाले अंतर्यामी हैं। आप परब्रह्म परमेश्वर हैं, आप सबके स्वामी हैं।

टेक

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,

क्षण में दूर करे॥

पद ४

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।

स्वामी तुम पालनकर्ता।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥

आप करुणा के सागर हैं, आप सबका पालन करने वाले हैं। मैं मूर्ख, दुष्ट और कामनाओं से भरा हूँ। हे भरण-पोषण करने वाले प्रभु, मुझ पर कृपा करो।

टेक

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,

क्षण में दूर करे॥

पद ५

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।

स्वामी सबके प्राणपति।

किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥

आप एक हैं, इंद्रियों की पहुँच से परे हैं, आप सबके प्राणों के स्वामी हैं। हे दयामय, मैं कुबुद्धि आपसे किस प्रकार मिलूँ?

टेक

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,

क्षण में दूर करे॥

पद ६

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

स्वामी तुम ठाकुर मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥

आप दीनों के बंधु और दुःखों को हरने वाले हैं, आप मेरे ठाकुर (प्रभु) हैं। अपना हाथ उठाकर आशीर्वाद दीजिए, मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ।

टेक

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,

क्षण में दूर करे॥

पद ७

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।

स्वामी पाप हरो देवा।

श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥

मेरे विषय-वासनाओं के विकार मिटा दो, हे देव, मेरे पाप हर लो। मेरी श्रद्धा और भक्ति बढ़ाओ, और संतों की सेवा का भाव बढ़ाओ।

टेक

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,

क्षण में दूर करे॥

स्रोत: Traditional text of Pt. Shardha Ram Phillauri's aarti as given by drikpanchang.com "Shri Jagdish Ji Ki Aarti", cross-checked line by line with bhaktibharat.com "Om Jai Jagdish Hare Aarti"; authorship per hi.wikipedia.org "ॐ जय जगदीश हरे"

ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।

getnitya.com/hi/vishnu/om-jai-jagdish-hare/