ॐ जय जगदीश हरे
Om Jai Jagdish Hare
ॐ जय जगदीश हरे सबसे प्रसिद्ध हिंदू आरतियों में से एक है। यह भगवान विष्णु को "जगदीश" यानी जगत के स्वामी कहकर गाया जाने वाला हिंदी भजन है, जिसे पंजाब के पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी ने लगभग १८७० में रचा। इसमें एक टेक और सात पद हैं, जिनमें दुःख दूर करने, दोष क्षमा करने और श्रद्धा बढ़ाने की प्रार्थना है। भारत और विदेशों में बहुत से परिवार अपनी पूजा और सत्यनारायण कथा इसी आरती से पूरी करते हैं।
- 8 पद
- 5 मिनट
- पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी (लगभग १८७०)
- उत्तम दिन: गुरुवार
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।Om Jai Jagdish Hare, Swami Jai Jagdish Hare
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,Bhakt Janon Ke Sankat, Das Janon Ke Sankat,
क्षण में दूर करे॥Kshan Mein Door Kare
ॐ, हे जगत के स्वामी हरि, आपकी जय हो! हे स्वामी, आपकी जय हो। आप अपने भक्तों और सेवकों के संकट क्षण भर में दूर कर देते हैं।
कुछ पुस्तकों में "दास जनों के संकट" नहीं है; गायन में प्रायः यह पंक्ति रहती है।
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।Jo Dhyave Phal Pave, Dukh Binse Man Ka
स्वामी दुःख बिनसे मन का।Swami Dukh Binse Man Ka
सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥Sukh Sampatti Ghar Aave, Kasht Mite Tan Ka
जो आपका ध्यान करता है उसे फल मिलता है और उसके मन का दुःख नष्ट हो जाता है। उसके घर सुख-सम्पत्ति आती है और तन का कष्ट मिट जाता है।
Also printed "दुःख विनसे" (same meaning: sorrow perishes).
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।Om Jai Jagdish Hare, Swami Jai Jagdish Hare
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,Bhakt Janon Ke Sankat, Das Janon Ke Sankat,
क्षण में दूर करे॥Kshan Mein Door Kare
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।Maat Pita Tum Mere, Sharan Gahun Main Kiski
स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।Swami Sharan Gahun Main Kiski
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥Tum Bin Aur Na Dooja, Aas Karun Jiski
आप ही मेरे माता-पिता हैं, मैं और किसकी शरण लूँ? आपके बिना दूसरा कोई नहीं, जिससे मैं आशा रखूँ।
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।Om Jai Jagdish Hare, Swami Jai Jagdish Hare
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,Bhakt Janon Ke Sankat, Das Janon Ke Sankat,
क्षण में दूर करे॥Kshan Mein Door Kare
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।Tum Puran Paramatma, Tum Antaryami
स्वामी तुम अन्तर्यामी।Swami Tum Antaryami
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥Parabrahm Parmeshwar, Tum Sabke Swami
आप पूर्ण परमात्मा हैं, आप सबके हृदय की जानने वाले अंतर्यामी हैं। आप परब्रह्म परमेश्वर हैं, आप सबके स्वामी हैं।
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।Om Jai Jagdish Hare, Swami Jai Jagdish Hare
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,Bhakt Janon Ke Sankat, Das Janon Ke Sankat,
क्षण में दूर करे॥Kshan Mein Door Kare
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।Tum Karuna Ke Sagar, Tum Palankarta
स्वामी तुम पालनकर्ता।Swami Tum Palankarta
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥Main Moorakh Khal Kami, Kripa Karo Bharta
आप करुणा के सागर हैं, आप सबका पालन करने वाले हैं। मैं मूर्ख, दुष्ट और कामनाओं से भरा हूँ। हे भरण-पोषण करने वाले प्रभु, मुझ पर कृपा करो।
प्रचलित पाठभेद: "मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता"।
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।Om Jai Jagdish Hare, Swami Jai Jagdish Hare
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,Bhakt Janon Ke Sankat, Das Janon Ke Sankat,
क्षण में दूर करे॥Kshan Mein Door Kare
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।Tum Ho Ek Agochar, Sabke Pranpati
स्वामी सबके प्राणपति।Swami Sabke Pranpati
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥Kis Vidhi Milun Dayamay, Tumko Main Kumati
आप एक हैं, इंद्रियों की पहुँच से परे हैं, आप सबके प्राणों के स्वामी हैं। हे दयामय, मैं कुबुद्धि आपसे किस प्रकार मिलूँ?
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।Om Jai Jagdish Hare, Swami Jai Jagdish Hare
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,Bhakt Janon Ke Sankat, Das Janon Ke Sankat,
क्षण में दूर करे॥Kshan Mein Door Kare
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।Deenbandhu Dukhharta, Tum Thakur Mere
स्वामी तुम ठाकुर मेरे।Swami Tum Thakur Mere
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥Apne Haath Uthao, Dwar Pada Tere
आप दीनों के बंधु और दुःखों को हरने वाले हैं, आप मेरे ठाकुर (प्रभु) हैं। अपना हाथ उठाकर आशीर्वाद दीजिए, मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ।
प्रचलित पाठभेद: "स्वामी रक्षक तुम मेरे … अपने हाथ उठाओ, अपनी शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे"।
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।Om Jai Jagdish Hare, Swami Jai Jagdish Hare
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,Bhakt Janon Ke Sankat, Das Janon Ke Sankat,
क्षण में दूर करे॥Kshan Mein Door Kare
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।Vishay Vikar Mitao, Paap Haro Deva
स्वामी पाप हरो देवा।Swami Paap Haro Deva
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥Shraddha Bhakti Badhao, Santan Ki Seva
मेरे विषय-वासनाओं के विकार मिटा दो, हे देव, मेरे पाप हर लो। मेरी श्रद्धा और भक्ति बढ़ाओ, और संतों की सेवा का भाव बढ़ाओ।
परंपरा "श्रद्धा" शब्द को कवि पं. श्रद्धाराम का संकेत मानती है। बहुत से परिवार अंत में "तन मन धन सब कुछ है तेरा, तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा" भी गाते हैं। यह बाद का जोड़ है।
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।Om Jai Jagdish Hare, Swami Jai Jagdish Hare
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,Bhakt Janon Ke Sankat, Das Janon Ke Sankat,
क्षण में दूर करे॥Kshan Mein Door Kare
पूर्ण
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प्रश्न
ॐ जय जगदीश हरे की रचना किसने की?
पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी (१८३७–१८८१) ने, लगभग १८७० में। वे पंजाब में लुधियाना के पास फिल्लौर के थे, और संस्कृत, हिंदी और पंजाबी के विद्वान और हिंदी गद्य के शुरुआती लेखकों में से एक थे। बहुत से लोग अंतिम पद के "श्रद्धा" शब्द को उनके नाम का संकेत मानते हैं।
ॐ जय जगदीश हरे किस भगवान की आरती है?
भगवान विष्णु की, जिन्हें "जगदीश" (जगत के स्वामी) और "हरि" (दुःख हरने वाले) कहा गया है। शब्द सरल हैं, इसलिए लोग इसे लक्ष्मी, गणेश, सत्यनारायण जैसी बहुत सी पूजाओं के अंत में भी गाते हैं।
क्या "तन मन धन सब कुछ है तेरा" आरती का भाग है?
नहीं, यह बाद में जुड़ी है। "तन, मन, धन सब तुम्हारा है; तुम्हारा ही तुम्हें अर्पण" वाली यह पंक्ति अंत में बहुत गाई जाती है, पर फिल्लौरी जी के मानक पाठ में नहीं है। आपके घर में गाई जाती है तो गाते रहिए। हमने इसे केवल इसलिए अलग रखा है कि मूल पाठ साफ़ दिखे।
घर में आरती कैसे करें?
थाली में घी का दीया या कपूर जलाएँ और भगवान के सामने खड़े हों। सब मिलकर गाएँ और थाली को घड़ी की दिशा में घुमाएँ, साथ में घंटी और ताली बजाएँ। हर पद के बाद टेक दोहराएँ। अंत में सबको आरती दें; लोग लौ पर हथेलियाँ घुमाकर आँखों से लगाते हैं।
स्रोत और समीक्षा
स्रोत: Traditional text of Pt. Shardha Ram Phillauri's aarti as given by drikpanchang.com "Shri Jagdish Ji Ki Aarti", cross-checked line by line with bhaktibharat.com "Om Jai Jagdish Hare Aarti"; authorship per hi.wikipedia.org "ॐ जय जगदीश हरे"
The two sources agree on the refrain and the seven stanzas; minor differences (बिनसे/विनसे, "दास जनों के संकट", "खल कामी"/"फलकामी", "ठाकुर"/"रक्षक") are recorded in the stanza notes. drikpanchang adds an eighth stanza "श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥", which is borrowed from the Shiva aarti and is not part of Phillauri's text, so we omit it. The popular "तन मन धन" closing couplet is likewise a later addition.
मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।
ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।