Nityaनित्य
कनकधारा स्तोत्रम्
Kanakadhara Stotram
कनकधारा स्तोत्रम् देवी लक्ष्मी की संस्कृत स्तुति है, जिसे परंपरा आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। इसके १८ श्लोकों में लक्ष्मी जी के करुणामय कटाक्ष की याचना है, और अंतिम श्लोक कहता है कि नित्य पाठ करने वाला कुबेर के समान हो जाता है। परंपरा के अनुसार बालक शंकर ने जब एक निर्धन स्त्री के लिए इसे गाया, तो लक्ष्मी जी ने उसके घर सोने के आँवले बरसाए; शुक्रवार, अक्षय तृतीया और दीपावली पर इसका पाठ होता है।
श्लोक १
अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती
भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम्।
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला
माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः॥
जैसे भ्रमरी कलियों से सजे तमाल वृक्ष के पास जाती है, वैसे ही लक्ष्मी जी का लीलामय कटाक्ष रोमांच से सुशोभित श्रीहरि के अंग पर टिका रहता है। उस कटाक्ष में समस्त ऐश्वर्य समाया है। मंगल की देवी का वह कटाक्ष मुझे मंगल प्रदान करे।
श्लोक २
मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः॥
जैसे भ्रमरी बड़े नीलकमल पर मँडराती है, वैसे ही उनकी दृष्टियों की माला प्रेम और लज्जा के साथ बार-बार मुरारि के मुख पर आती-जाती है। समुद्र से प्रकट हुई देवी की वह दृष्टि मुझे समृद्धि दे।
श्लोक ३
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम्
आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्
इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः॥
जो दृष्टि देवताओं को इन्द्र पद का वैभव देने में समर्थ है और मुर के शत्रु विष्णु को भी अधिक आनंद देती है, नीलकमल के भीतरी भाग जैसी उस इन्दिरा की अर्ध-दृष्टि क्षण भर मुझ पर भी थोड़ी ठहरे।
श्लोक ४
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम्
आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम्।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः॥
अधमुँदी आँखों वाले, आनंद के मूल, प्रेम से भरे मुकुंद को आनंद से निहारती, बिना पलक झपकाए तिरछी चितवन में ठहरी पुतली और पलकों वाली, शेषशायी भगवान की प्रिया की वह आँख मेरी समृद्धि का कारण बने।
श्लोक ५
बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः॥
मधुसूदन के कौस्तुभ मणि वाले वक्ष पर जो कटाक्षों की माला इन्द्रनील मणियों के हार जैसी शोभित होती है, जो भगवान की भी कामनाएँ पूरी करती है, कमल में निवास करने वाली लक्ष्मी की वह कटाक्ष-माला मेरा कल्याण करे।
श्लोक ६
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेः
धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव।
मातुस्समस्तजगतां महनीयमूर्तिः
भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः॥
कैटभ के शत्रु विष्णु के काले मेघों जैसे सुंदर वक्ष पर जो बिजली की रेखा जैसी चमकती हैं, समस्त लोकों की माता, भृगु की पुत्री की वह पूजनीय मूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करे।
श्लोक ७
प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावात्
माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं
मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः॥
जिस दृष्टि के प्रभाव से कामदेव ने पहले-पहल मंगलमय मधुसूदन में स्थान पाया, समुद्र की पुत्री की वह धीमी, मंद और अलसाई अर्ध-दृष्टि यहाँ मुझ पर भी पड़े।
श्लोक ८
दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम्
अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं
नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः॥
नारायण की प्रिया के नेत्र रूपी मेघ, दया की पवन से प्रेरित होकर, मुझ जैसे दुखी और निर्धन पक्षी-शिशु पर धन रूपी जल की धारा बरसाएँ और मेरे बुरे कर्मों की तपन को सदा के लिए दूर कर दें।
श्लोक ९
इष्टाविशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र-
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते।
दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः॥
जिनकी करुणा से भीगी दृष्टि से साधारण पुण्य वाले लोग भी सहज ही स्वर्ग पा लेते हैं, कमल के आसन वाली देवी की खिले कमल जैसी दीप्तिमान वह दृष्टि मुझे मनचाही पुष्टि दे।
श्लोक १०
गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति
शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै॥
जिन्हें वाणी की देवी, गरुड़ध्वज विष्णु की सुंदरी, शाकंभरी और चंद्रशेखर शिव की प्रिया कहा जाता है, जो सृष्टि, पालन और प्रलय की लीला में स्थित हैं, तीनों लोकों के एकमात्र गुरु की उन युवा पत्नी को नमस्कार है।
श्लोक ११
श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै॥
शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति रूपा को नमस्कार। सुंदर गुणों की सागर रति रूपा को नमस्कार। शतदल कमल में रहने वाली शक्ति रूपा को नमस्कार। पुरुषोत्तम की प्रिया पुष्टि रूपा को नमस्कार।
श्लोक १२
नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै।
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै॥
कमल जैसे मुख वाली को नमस्कार। क्षीरसागर से प्रकट होने वाली को नमस्कार। चंद्रमा और अमृत की बहन को नमस्कार। नारायण की प्रिया को नमस्कार।
श्लोक १३
सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये॥
हे कमलनयनी, पूजनीय माता, आपकी वंदनाएँ संपत्ति देने वाली, सब इंद्रियों को आनंद देने वाली, साम्राज्य देने में समर्थ और पाप हरने को तत्पर हैं। वे सदा मेरे साथ रहें।
श्लोक १४
यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः
सेवकस्य सकलार्थसम्पदः।
सन्तनोति वचनाङ्गमानसैः
त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे॥
जिनके कटाक्ष की उपासना सेवक को सब प्रकार की संपदा देती है, मुरारि के हृदय की स्वामिनी उन आपको मैं वाणी, शरीर और मन से भजता हूँ।
श्लोक १५
सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्॥
हे कमल में निवास करने वाली, हाथ में कमल धारण करने वाली, उज्ज्वल श्वेत वस्त्र, चंदन और मालाओं से सुशोभित, हे भगवती, हे हरिप्रिया, हे मनोहर, तीनों लोकों को ऐश्वर्य देने वाली, मुझ पर प्रसन्न होइए।
श्लोक १६
दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट-
स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम्।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष-
लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम्॥
दिशाओं के हाथी जिन पर सोने के कलशों से आकाशगंगा का निर्मल, सुंदर जल डालते हैं, उन जगत की जननी, समस्त लोकों के स्वामी की गृहिणी, अमृत सागर की पुत्री को मैं प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ।
श्लोक १७
कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं
करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः।
अवलोकय मामकिञ्चनानां
प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः॥
हे कमला, कमलनयन प्रभु की प्रिया, करुणा की बाढ़ से लहराती अपनी चितवनों से मुझे देखिए। मैं निर्धनों में पहला हूँ, इसलिए आपकी दया का सबसे स्वाभाविक पात्र हूँ।
श्लोक १८
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो
भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः॥
जो लोग इन स्तुतियों से प्रतिदिन तीनों वेदों की स्वरूपा, तीनों लोकों की माता रमा की स्तुति करते हैं, वे गुणों में श्रेष्ठ, महान सौभाग्य के भागी होते हैं और पृथ्वी पर विद्वान उनका आदर करते हैं।
फलश्रुति
सुवर्णधारास्तोत्रं यच्छङ्कराचार्यनिर्मितम्।
त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं स कुबेरसमो भवेत्॥
शंकराचार्य द्वारा रचित इस स्वर्णधारा स्तोत्र का जो प्रतिदिन तीनों संध्याओं में पाठ करता है, वह कुबेर के समान हो जाता है।