कनकधारा स्तोत्रम्
Kanakadhara Stotram
कनकधारा स्तोत्रम् देवी लक्ष्मी की संस्कृत स्तुति है, जिसे परंपरा आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। इसके १८ श्लोकों में लक्ष्मी जी के करुणामय कटाक्ष की याचना है, और अंतिम श्लोक कहता है कि नित्य पाठ करने वाला कुबेर के समान हो जाता है। परंपरा के अनुसार बालक शंकर ने जब एक निर्धन स्त्री के लिए इसे गाया, तो लक्ष्मी जी ने उसके घर सोने के आँवले बरसाए; शुक्रवार, अक्षय तृतीया और दीपावली पर इसका पाठ होता है।
- 19 पद
- 8 मिनट
- आदि शंकराचार्य (परंपरा के अनुसार)
- उत्तम दिन: शुक्रवार
अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्तीAngam Hareh Pulaka Bhushanam Ashrayanti
भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम्।Bhringanganeva Mukulabharanam Tamalam
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीलाAngikritakhila Vibhutir Apanga Leela
माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः॥Mangalyadastu Mama Mangala Devatayah
जैसे भ्रमरी कलियों से सजे तमाल वृक्ष के पास जाती है, वैसे ही लक्ष्मी जी का लीलामय कटाक्ष रोमांच से सुशोभित श्रीहरि के अंग पर टिका रहता है। उस कटाक्ष में समस्त ऐश्वर्य समाया है। मंगल की देवी का वह कटाक्ष मुझे मंगल प्रदान करे।
- अङ्गं हरेःश्रीहरि के अंग को
- पुलकभूषणम्रोमांच से सुशोभित
- आश्रयन्तीआश्रय लेती हुई
- भृङ्गाङ्गना इवभ्रमरी की तरह
- मुकुलाभरणं तमालम्कलियों से सजे तमाल वृक्ष पर
- अङ्गीकृताखिलविभूतिःजिसमें समस्त ऐश्वर्य समाया है
- अपाङ्गलीलाकटाक्ष की लीला
- माङ्गल्यदा अस्तु मममुझे मंगल देने वाली हो
- मङ्गलदेवतायाःमंगल की देवी (लक्ष्मी) की
तमाल गहरे रंग का वृक्ष है, जो काव्य में विष्णु के श्याम शरीर की उपमा बनता है। यहाँ से श्लोक ९ तक हर श्लोक लक्ष्मी जी के कटाक्ष की याचना करता है।
मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेःMugdha Muhur Vidadhati Vadane Murareh
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।Prema Trapa Pranihitani Gatagatani
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले याMala Drishor Madhukariva Mahotpale Ya
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः॥Sa Me Shriyam Dishatu Sagara Sambhavayah
जैसे भ्रमरी बड़े नीलकमल पर मँडराती है, वैसे ही उनकी दृष्टियों की माला प्रेम और लज्जा के साथ बार-बार मुरारि के मुख पर आती-जाती है। समुद्र से प्रकट हुई देवी की वह दृष्टि मुझे समृद्धि दे।
- मुग्धामनोहर, भोली
- मुहुः विदधतीबार-बार करती हुई
- वदने मुरारेःमुरारि के मुख पर
- प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानिप्रेम और लज्जा से भरे आना-जाना
- माला दृशोःदृष्टियों की माला
- मधुकरी इव महोत्पलेबड़े नीलकमल पर भ्रमरी की तरह
- सा मे श्रियं दिशतुवह मुझे श्री (समृद्धि) दे
- सागरसम्भवायाःसमुद्र से उत्पन्न देवी की
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम्Vishvamarendra Pada Vibhrama Dana Daksham
आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि।Ananda Heturadhikam Muravidvishopi
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्Ishan Nishidatu Mayi Kshanam Ikshanardham
इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः॥Indivarodara Sahodaram Indirayah
जो दृष्टि देवताओं को इन्द्र पद का वैभव देने में समर्थ है और मुर के शत्रु विष्णु को भी अधिक आनंद देती है, नीलकमल के भीतरी भाग जैसी उस इन्दिरा की अर्ध-दृष्टि क्षण भर मुझ पर भी थोड़ी ठहरे।
- विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम्इन्द्र के पद का वैभव देने में समर्थ
- आनन्दहेतुः अधिकम्अधिक आनंद का कारण
- मुरविद्विषः अपिमुर के शत्रु विष्णु के लिए भी
- ईषत् निषीदतु मयि क्षणम्मुझ पर क्षण भर थोड़ा ठहरे
- ईक्षणार्धम्अर्ध-दृष्टि, कटाक्ष
- इन्दीवरोदरसहोदरम्नीलकमल के भीतरी भाग जैसा
- इन्दिरायाःइन्दिरा (लक्ष्मी) का
स्तोत्रनिधि में यहाँ "ईक्षणार्थम्" छपा है; sanskritdocuments.org में "ईक्षणार्धम्" (अर्ध-दृष्टि) है, जो श्लोक ७ से मेल खाता है। हमने यही पाठ लिया है।
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम्Amilitaksham Adhigamya Muda Mukundam
आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम्।Ananda Kandam Animesham Ananga Tantram
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रंAkekara Sthita Kaninika Pakshma Netram
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः॥Bhutyai Bhaven Mama Bhujanga Shayanganayah
अधमुँदी आँखों वाले, आनंद के मूल, प्रेम से भरे मुकुंद को आनंद से निहारती, बिना पलक झपकाए तिरछी चितवन में ठहरी पुतली और पलकों वाली, शेषशायी भगवान की प्रिया की वह आँख मेरी समृद्धि का कारण बने।
- आमीलिताक्षम्अधमुँदी आँखों वाले
- अधिगम्य मुदा मुकुन्दम्आनंद से मुकुंद तक पहुँचकर
- आनन्दकन्दम्आनंद के मूल
- अनिमेषम्बिना पलक झपकाए
- अनङ्गतन्त्रम्प्रेम से भरा
- आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रम्तिरछी चितवन में ठहरी पुतली और पलकों वाला नेत्र
- भूत्यै भवेत् मममेरी समृद्धि के लिए हो
- भुजङ्गशयाङ्गनायाःशेषशायी भगवान की प्रिया का
बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे याBahvantare Madhujitah Shrita Kaustubhe Ya
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।Haravaliva Hari Neelamayi Vibhati
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमालाKamaprada Bhagavatopi Kataksha Mala
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः॥Kalyanam Avahatu Me Kamalalayayah
मधुसूदन के कौस्तुभ मणि वाले वक्ष पर जो कटाक्षों की माला इन्द्रनील मणियों के हार जैसी शोभित होती है, जो भगवान की भी कामनाएँ पूरी करती है, कमल में निवास करने वाली लक्ष्मी की वह कटाक्ष-माला मेरा कल्याण करे।
- बाह्वन्तरे मधुजितःमधुसूदन के वक्ष पर
- श्रितकौस्तुभेजहाँ कौस्तुभ मणि है
- हारावली इव हरिनीलमयीइन्द्रनील मणियों की माला जैसी
- विभातिशोभित होती है
- कामप्रदा भगवतः अपिभगवान की भी कामनाएँ पूरी करने वाली
- कटाक्षमालाकटाक्षों की माला
- कल्याणम् आवहतु मेमेरा कल्याण करे
- कमलालयायाःकमल में निवास करने वाली की
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेःKalambudali Lalitorasi Kaitabhareh
धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव।Dharadhare Sphurati Ya Tadid Anganeva
मातुस्समस्तजगतां महनीयमूर्तिःMatus Samasta Jagatam Mahaniya Murtih
भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः॥Bhadrani Me Dishatu Bhargava Nandanayah
कैटभ के शत्रु विष्णु के काले मेघों जैसे सुंदर वक्ष पर जो बिजली की रेखा जैसी चमकती हैं, समस्त लोकों की माता, भृगु की पुत्री की वह पूजनीय मूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करे।
- कालाम्बुदालिललितोरसिकाले मेघों जैसे सुंदर वक्ष पर
- कैटभारेःकैटभ के शत्रु विष्णु के
- धाराधरे स्फुरतिमेघ में चमकती है
- तडिदङ्गना इवबिजली की रेखा जैसी
- मातुः समस्तजगताम्समस्त लोकों की माता की
- महनीयमूर्तिःपूजनीय मूर्ति
- भद्राणि मे दिशतुमुझे कल्याण दे
- भार्गवनन्दनायाःभृगु की पुत्री (भार्गवी) की
स्तोत्रनिधि में "तटिदङ्गनेव" छपा है; हमने sanskritdocuments.org का "तडिदङ्गनेव" (तडित् यानी बिजली) लिया है। परंपरा के अनुसार लक्ष्मी एक बार भृगु ऋषि की पुत्री बनकर जन्मीं, इसलिए उन्हें भार्गवी कहते हैं।
प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावात्Praptam Padam Prathamatah Khalu Yat Prabhavat
माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन।Mangalya Bhaji Madhumathini Manmathena
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धंMayyapatet Tadiha Mantharam Ikshanardham
मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः॥Mandalasam Cha Makaralaya Kanyakayah
जिस दृष्टि के प्रभाव से कामदेव ने पहले-पहल मंगलमय मधुसूदन में स्थान पाया, समुद्र की पुत्री की वह धीमी, मंद और अलसाई अर्ध-दृष्टि यहाँ मुझ पर भी पड़े।
- प्राप्तं पदं प्रथमतःपहले-पहल स्थान पाया
- खलु यत्प्रभावात्जिसके प्रभाव से
- माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनिमंगलमय मधुसूदन में
- मन्मथेनकामदेव ने
- मयि आपतेत् तत् इहवह यहाँ मुझ पर पड़े
- मन्थरम् ईक्षणार्धम्धीमी अर्ध-दृष्टि
- मन्दालसं चमंद और अलसाई
- मकरालयकन्यकायाःसमुद्र की पुत्री की
दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम्Dadyad Dayanupavano Dravinambu Dharam
अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे।Asminn Akinchana Vihanga Shishau Vishanne
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरंDushkarma Gharmam Apaniya Chiraya Duram
नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः॥Narayana Pranayini Nayanambu Vahah
नारायण की प्रिया के नेत्र रूपी मेघ, दया की पवन से प्रेरित होकर, मुझ जैसे दुखी और निर्धन पक्षी-शिशु पर धन रूपी जल की धारा बरसाएँ और मेरे बुरे कर्मों की तपन को सदा के लिए दूर कर दें।
- दद्यात्बरसाए
- दयानुपवनःदया की पवन से प्रेरित
- द्रविणाम्बुधाराम्धन रूपी जल की धारा
- अस्मिन् अकिञ्चनविहङ्गशिशौइस निर्धन पक्षी-शिशु (मुझ) पर
- विषण्णेजो दुखी है
- दुष्कर्मघर्मम् अपनीयबुरे कर्मों की तपन को दूर करके
- चिराय दूरम्सदा के लिए दूर
- नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहःनारायण की प्रिया के नेत्र रूपी मेघ
यहाँ चातक पक्षी की उपमा है, जो काव्य के अनुसार केवल मेघ का जल पीता है। इसी श्लोक से स्तोत्र को नाम मिला: धन की "धारा"। स्तोत्रनिधि में "अस्मिन्न किञ्चन विहङ्गशिशौ" अलग छपा है; हमने sanskritdocuments.org का "अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ" (अकिंचन यानी निर्धन) लिया है।
इष्टाविशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र-Ishta Vishishta Matayopi Yaya Dayardra
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते।Drishtya Trivishtapa Padam Sulabham Labhante
दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टांDrishtih Prahrishta Kamalodara Diptir Ishtam
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः॥Pushtim Krishishta Mama Pushkara Vishtarayah
जिनकी करुणा से भीगी दृष्टि से साधारण पुण्य वाले लोग भी सहज ही स्वर्ग पा लेते हैं, कमल के आसन वाली देवी की खिले कमल जैसी दीप्तिमान वह दृष्टि मुझे मनचाही पुष्टि दे।
- इष्टाविशिष्टमतयः अपिसाधारण बुद्धि और पुण्य वाले भी
- यया दयार्द्रदृष्ट्याजिनकी करुणा से भीगी दृष्टि से
- त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्तेस्वर्ग पद सहज ही पा लेते हैं
- दृष्टिःवह दृष्टि
- प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिःखिले कमल के भीतरी भाग जैसी दीप्तिमान
- इष्टां पुष्टिं कृषीष्ट मममुझे मनचाही पुष्टि दे
- पुष्करविष्टरायाःकमल के आसन वाली की
"इष्टाविशिष्टमतयः" को भाष्यकार इष्ट + अविशिष्टमतयः तोड़ते हैं, यानी जिनका पुण्य साधारण है।
गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीतिGirdevateti Garudadhvaja Sundariti
शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति।Shakambhariti Shashi Shekhara Vallabheti
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायैSrishti Sthiti Pralaya Kelishu Samsthitayai
तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै॥Tasyai Namas Tribhuvanaika Guros Tarunyai
जिन्हें वाणी की देवी, गरुड़ध्वज विष्णु की सुंदरी, शाकंभरी और चंद्रशेखर शिव की प्रिया कहा जाता है, जो सृष्टि, पालन और प्रलय की लीला में स्थित हैं, तीनों लोकों के एकमात्र गुरु की उन युवा पत्नी को नमस्कार है।
- गीर्देवता इतिवाणी की देवी (सरस्वती) के रूप में
- गरुडध्वजसुन्दरी इतिगरुड़ध्वज विष्णु की सुंदरी के रूप में
- शाकम्भरी इतिजगत का पोषण करने वाली शाकंभरी के रूप में
- शशिशेखरवल्लभा इतिचंद्रशेखर शिव की प्रिया के रूप में
- सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायैसृष्टि, पालन और प्रलय की लीला में स्थित को
- तस्यै नमःउन्हें नमस्कार
- त्रिभुवनैकगुरोः तरुण्यैतीनों लोकों के एकमात्र गुरु की युवा पत्नी को
यह श्लोक सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती में एक ही देवी को देखता है। sanskritdocuments.org में "गरुडध्वजभामिनीति" पाठांतर दिया है।
श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यैShrutyai Namostu Shubha Karma Phala Prasutyai
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै।Ratyai Namostu Ramaniya Gunarnavayai
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायैShaktyai Namostu Shatapatra Niketanayai
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै॥Pushtyai Namostu Purushottama Vallabhayai
शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति रूपा को नमस्कार। सुंदर गुणों की सागर रति रूपा को नमस्कार। शतदल कमल में रहने वाली शक्ति रूपा को नमस्कार। पुरुषोत्तम की प्रिया पुष्टि रूपा को नमस्कार।
- श्रुत्यै नमोऽस्तुश्रुति (वेद) रूपा को नमस्कार
- शुभकर्मफलप्रसूत्यैशुभ कर्मों का फल देने वाली को
- रत्यैरति (आनंद) रूपा को
- रमणीयगुणार्णवायैसुंदर गुणों के सागर को
- शक्त्यैशक्ति रूपा को
- शतपत्रनिकेतनायैसौ पंखुड़ियों वाले कमल में रहने वाली को
- पुष्ट्यैपुष्टि रूपा को
- पुरुषोत्तमवल्लभायैपुरुषोत्तम की प्रिया को
नमोऽस्तु नालीकनिभाननायैNamostu Nalika Nibhananayai
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै।Namostu Dugdhodadhi Janma Bhumyai
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायैNamostu Somamrita Sodarayai
नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै॥Namostu Narayana Vallabhayai
कमल जैसे मुख वाली को नमस्कार। क्षीरसागर से प्रकट होने वाली को नमस्कार। चंद्रमा और अमृत की बहन को नमस्कार। नारायण की प्रिया को नमस्कार।
- नमोऽस्तुनमस्कार हो
- नालीकनिभाननायैकमल जैसे मुख वाली को
- दुग्धोदधिजन्मभूम्यैक्षीरसागर जिनकी जन्मभूमि है
- सोमामृतसोदरायैचंद्रमा और अमृत की बहन को
- नारायणवल्लभायैनारायण की प्रिया को
चंद्रमा और अमृत भी समुद्र मंथन से निकले, इसलिए उन्हें लक्ष्मी के भाई-बहन कहा गया है। कुछ पुस्तकें इसके बाद "नमोऽस्तु" वाले दो-तीन श्लोक और जोड़ती हैं; हमने मानक पाठ के १८ श्लोक दिए हैं।
सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानिSampatkarani Sakalendriya Nandanani
साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि।Samrajya Dana Vibhavani Saroruhakshi
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानिTvad Vandanani Duritaharanodyatani
मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये॥Mameva Matar Anisham Kalayantu Manye
हे कमलनयनी, पूजनीय माता, आपकी वंदनाएँ संपत्ति देने वाली, सब इंद्रियों को आनंद देने वाली, साम्राज्य देने में समर्थ और पाप हरने को तत्पर हैं। वे सदा मेरे साथ रहें।
- सम्पत्कराणिसंपत्ति देने वाले
- सकलेन्द्रियनन्दनानिसब इंद्रियों को आनंद देने वाले
- साम्राज्यदानविभवानिसाम्राज्य देने की सामर्थ्य वाले
- सरोरुहाक्षिहे कमलनयनी
- त्वद्वन्दनानिआपकी वंदनाएँ
- दुरिताहरणोद्यतानिपाप हरने को तत्पर
- माम् एव कलयन्तु अनिशम्सदा मेरे साथ रहें
- मातः मान्येहे पूजनीय माता
sanskritdocuments.org में "दुरितोत्तरणोद्यतानि" और "दुरितोद्धरणोद्यतानि" पाठांतर दिए हैं।
यत्कटाक्षसमुपासनाविधिःYat Kataksha Samupasana Vidhih
सेवकस्य सकलार्थसम्पदः।Sevakasya Sakalartha Sampadah
सन्तनोति वचनाङ्गमानसैःSantanoti Vachananga Manasaih
त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे॥Tvam Murari Hridayeshvarim Bhaje
जिनके कटाक्ष की उपासना सेवक को सब प्रकार की संपदा देती है, मुरारि के हृदय की स्वामिनी उन आपको मैं वाणी, शरीर और मन से भजता हूँ।
- यत्कटाक्षसमुपासनाविधिःजिनके कटाक्ष की उपासना
- सेवकस्यसेवक के लिए
- सकलार्थसम्पदः सन्तनोतिसब प्रकार की संपदा फैलाती है
- वचनाङ्गमानसैःवाणी, शरीर और मन से
- त्वाम्आपको
- मुरारिहृदयेश्वरीम्मुरारि के हृदय की स्वामिनी
- भजेभजता हूँ
सरसिजनिलये सरोजहस्तेSarasija Nilaye Saroja Haste
धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे।Dhavalatamamshuka Gandha Malya Shobhe
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञेBhagavati Hari Vallabhe Manogye
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्॥Tribhuvana Bhutikari Prasida Mahyam
हे कमल में निवास करने वाली, हाथ में कमल धारण करने वाली, उज्ज्वल श्वेत वस्त्र, चंदन और मालाओं से सुशोभित, हे भगवती, हे हरिप्रिया, हे मनोहर, तीनों लोकों को ऐश्वर्य देने वाली, मुझ पर प्रसन्न होइए।
- सरसिजनिलयेहे कमल में निवास करने वाली
- सरोजहस्तेहाथ में कमल लिए
- धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभेउज्ज्वल श्वेत वस्त्र, चंदन और मालाओं से सुशोभित
- भगवतिहे भगवती
- हरिवल्लभेहे हरि की प्रिया
- मनोज्ञेहे मनोहर
- त्रिभुवनभूतिकरितीनों लोकों को ऐश्वर्य देने वाली
- प्रसीद मह्यम्मुझ पर प्रसन्न हों
यह श्लोक अलग से लक्ष्मी ध्यान श्लोक के रूप में भी पढ़ा जाता है, और श्रीसूक्त के बाद जोड़े जाने वाले श्लोकों में भी आता है।
दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट-Digghastibhih Kanaka Kumbha Mukhavasrishta
स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम्।Svarvahini Vimala Charu Jala Plutangim
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष-Pratar Namami Jagatam Jananim Ashesha
लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम्॥Lokadhinatha Grihinim Amritabdhi Putrim
दिशाओं के हाथी जिन पर सोने के कलशों से आकाशगंगा का निर्मल, सुंदर जल डालते हैं, उन जगत की जननी, समस्त लोकों के स्वामी की गृहिणी, अमृत सागर की पुत्री को मैं प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ।
- दिग्घस्तिभिःदिशाओं के हाथियों द्वारा
- कनककुम्भमुखावसृष्टसोने के कलशों के मुख से गिराए गए
- स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम्आकाशगंगा के निर्मल सुंदर जल से नहाए अंगों वाली
- प्रातः नमामिप्रातःकाल नमस्कार करता हूँ
- जगतां जननीम्जगत की जननी को
- अशेषलोकाधिनाथगृहिणीम्समस्त लोकों के स्वामी की गृहिणी को
- अमृताब्धिपुत्रीम्अमृत सागर की पुत्री को
यह गजलक्ष्मी का रूप है, हाथियों द्वारा स्नान कराई जाती लक्ष्मी। sanskritdocuments.org में "दिग् हस्तिभिः" अलग लिखा है; उच्चारण वही है।
कमले कमलाक्षवल्लभे त्वंKamale Kamalaksha Vallabhe Tvam
करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः।Karuna Pura Tarangitair Apangaih
अवलोकय मामकिञ्चनानांAvalokaya Mam Akinchananam
प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः॥Prathamam Patram Akritrimam Dayayah
हे कमला, कमलनयन प्रभु की प्रिया, करुणा की बाढ़ से लहराती अपनी चितवनों से मुझे देखिए। मैं निर्धनों में पहला हूँ, इसलिए आपकी दया का सबसे स्वाभाविक पात्र हूँ।
- कमलेहे कमला
- कमलाक्षवल्लभेहे कमलनयन प्रभु की प्रिया
- त्वम्आप
- करुणापूरतरङ्गितैः अपाङ्गैःकरुणा की बाढ़ से लहराती चितवनों से
- अवलोकय माम्मुझे देखिए
- अकिञ्चनानां प्रथमम्निर्धनों में पहला
- पात्रम् अकृत्रिमं दयायाःआपकी दया का स्वाभाविक पात्र
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहंStuvanti Ye Stutibhir Amubhir Anvaham
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।Trayimayim Tribhuvana Mataram Ramam
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनोGunadhika Gurutara Bhagya Bhagino
भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः॥Bhavanti Te Bhuvi Budha Bhavitashayah
जो लोग इन स्तुतियों से प्रतिदिन तीनों वेदों की स्वरूपा, तीनों लोकों की माता रमा की स्तुति करते हैं, वे गुणों में श्रेष्ठ, महान सौभाग्य के भागी होते हैं और पृथ्वी पर विद्वान उनका आदर करते हैं।
- स्तुवन्ति येजो स्तुति करते हैं
- स्तुतिभिः अमूभिःइन स्तुतियों से
- अन्वहम्प्रतिदिन
- त्रयीमयीम्तीनों वेदों की स्वरूपा
- त्रिभुवनमातरं रमाम्तीनों लोकों की माता रमा को
- गुणाधिकाःगुणों में श्रेष्ठ
- गुरुतरभाग्यभागिनःमहान सौभाग्य के भागी
- भवन्ति ते भुविवे पृथ्वी पर होते हैं
- बुधभाविताशयाःजिनके भाव का विद्वान आदर करते हैं
स्तोत्रनिधि में "अमूभिः" और "भाग्यभाजिनो" है; sanskritdocuments.org में "अमीभिः" और "भाग्यभागिनो"। हमने "अमूभिः" लिया है, क्योंकि स्त्रीलिंग "स्तुतिभिः" के साथ यही रूप ठीक बैठता है, और "भागिनो" लिया है; भागिनः और भाजिनः दोनों का अर्थ "भागी" है।
सुवर्णधारास्तोत्रं यच्छङ्कराचार्यनिर्मितम्।Suvarnadhara Stotram Yacchankaracharya Nirmitam
त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं स कुबेरसमो भवेत्॥Trisandhyam Yah Pathen Nityam Sa Kubera Samo Bhavet
शंकराचार्य द्वारा रचित इस स्वर्णधारा स्तोत्र का जो प्रतिदिन तीनों संध्याओं में पाठ करता है, वह कुबेर के समान हो जाता है।
- सुवर्णधारास्तोत्रम्स्वर्णधारा (कनकधारा) स्तोत्र
- यत् शङ्कराचार्यनिर्मितम्जो शंकराचार्य द्वारा रचित है
- त्रिसन्ध्यम्तीनों संध्याओं में
- यः पठेत् नित्यम्जो प्रतिदिन पढ़ता है
- सः कुबेरसमः भवेत्वह कुबेर के समान हो जाता है
यह बाद का फलश्रुति श्लोक है, जो कई छपी पुस्तकों में श्लोक १८ के बाद मिलता है (स्तोत्रनिधि इसे अधिक श्लोक बताता है)। इसमें परंपरा द्वारा माना गया फल है; यह श्रद्धा का वचन है।
पूर्ण
कनकधारा स्तोत्रम् का पाठ पूर्ण हुआ।
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प्रश्न
कनकधारा स्तोत्र की कथा क्या है?
परंपरा के अनुसार बालक शंकर भिक्षा माँगते हुए एक बहुत निर्धन घर पहुँचे, जहाँ स्त्री के पास देने को केवल एक आँवला था। शंकर ने लक्ष्मी जी की यह स्तुति गाई और उस घर पर सोने के आँवले बरसे। इसी से नाम पड़ा: कनकधारा, सोने की धारा।
कनकधारा स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?
मानक पाठ में १८ श्लोक हैं, फिर एक छोटा फलश्रुति श्लोक। कुछ छपी पुस्तकें सात तक और श्लोक जोड़ती हैं, इसलिए कहीं २१ या २५ श्लोक भी दिखते हैं। इस पृष्ठ पर १८ श्लोक और फलश्रुति है।
क्या दीपावली की रात लक्ष्मी पूजन के बाद कनकधारा स्तोत्र पढ़ सकते हैं?
हाँ। दीपावली, धनतेरस और अक्षय तृतीया पर यह सबसे प्रचलित लक्ष्मी स्तोत्रों में है, जो पूजन के बाद, आरती से पहले या बाद में पढ़ा जाता है। इसमें लगभग आठ मिनट लगते हैं।
क्या कनकधारा स्तोत्र से दरिद्रता दूर होती है?
परंपरा कहती है कि इससे लक्ष्मी जी की कृपा और अभाव से मुक्ति मिलती है, और अंतिम श्लोक पाठ करने वाले को कुबेर समान बताता है। ये श्रद्धा की बातें हैं। स्तोत्र मुख्य रूप से करुणा की प्रार्थना है, और इसकी कथा एक निर्धन स्त्री की उदारता की है।
स्रोत और समीक्षा
स्रोत: Kanakadhara Stotram, sanskritdocuments.org kanaka.itx (encoded and proofread by P. P. Narayanaswami and Kirk Wortman; verse order as in the Complete Works of Shankaracharya, vol. 18, p. 70); cross-checked line by line with "Prabhata Stotranidhi" (stotranidhi.com, Devanagari)
18 verses, the count and order shared by both sources, plus the phala verse "सुवर्णधारास्तोत्रं यच्छङ्कराचार्यनिर्मितम्" that many books print after verse 18. Left out: the opening Ganesha verse "वन्दे वन्दारुमन्दारम्" (sanskritdocuments only) and the extra verses that both sources mark as additions ("नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायै", "नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै", "नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै", "देवि प्रसीद जगदीश्वरि", "बिल्वाटवीमध्यलसत्सरोजे", "कमलासनपाणिना ललाटे", "अम्भोरुहं जन्मगृहं भवत्याः"). Readings where the sources differ: v1 "माङ्गल्यदास्तु" (stotranidhi; sanskritdocuments "माङ्गल्यदाऽस्तु", same sound); v2 "माला दृशोः" spaced (stotranidhi joins it); v3 "ईक्षणार्धम्" (sanskritdocuments; stotranidhi "ईक्षणार्थम्"); v6 "तडिदङ्गनेव" (sanskritdocuments; stotranidhi "तटिदङ्गनेव"); v8 "अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ" (sanskritdocuments; stotranidhi divides "अस्मिन्न किञ्चन"); v16 "दिग्घस्तिभिः" (stotranidhi; sanskritdocuments "दिग् हस्तिभिः"); v18 "अमूभिः" (stotranidhi; sanskritdocuments "अमीभिः") and "भाग्यभागिनो" (sanskritdocuments; stotranidhi "भाग्यभाजिनो"). Where a compound runs across a line, stotranidhi uses hyphens with sandhi ("दक्ष- / -मानन्द"); we follow sanskritdocuments and write the words in full at the line break ("दक्षम् / आनन्द"), keeping a hyphen only inside a compound (v9, v16). Variants noted by sanskritdocuments: "गरुडध्वजभामिनीति" (v10), "सरोरुहाणि" (v13), "दुरितोत्तरणोद्यतानि" / "दुरितोद्धरणोद्यतानि" (v13). The attribution to Adi Shankaracharya is traditional.
मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।
ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।