कनकधारा स्तोत्रम्

Kanakadhara Stotram

कनकधारा स्तोत्रम् देवी लक्ष्मी की संस्कृत स्तुति है, जिसे परंपरा आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। इसके १८ श्लोकों में लक्ष्मी जी के करुणामय कटाक्ष की याचना है, और अंतिम श्लोक कहता है कि नित्य पाठ करने वाला कुबेर के समान हो जाता है। परंपरा के अनुसार बालक शंकर ने जब एक निर्धन स्त्री के लिए इसे गाया, तो लक्ष्मी जी ने उसके घर सोने के आँवले बरसाए; शुक्रवार, अक्षय तृतीया और दीपावली पर इसका पाठ होता है।

  • 19 पद
  • 8 मिनट
  • आदि शंकराचार्य (परंपरा के अनुसार)
  • उत्तम दिन: शुक्रवार

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अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्तीAngam Hareh Pulaka Bhushanam Ashrayanti

भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम्।Bhringanganeva Mukulabharanam Tamalam

अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीलाAngikritakhila Vibhutir Apanga Leela

माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः॥Mangalyadastu Mama Mangala Devatayah

जैसे भ्रमरी कलियों से सजे तमाल वृक्ष के पास जाती है, वैसे ही लक्ष्मी जी का लीलामय कटाक्ष रोमांच से सुशोभित श्रीहरि के अंग पर टिका रहता है। उस कटाक्ष में समस्त ऐश्वर्य समाया है। मंगल की देवी का वह कटाक्ष मुझे मंगल प्रदान करे।

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेःMugdha Muhur Vidadhati Vadane Murareh

प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।Prema Trapa Pranihitani Gatagatani

माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले याMala Drishor Madhukariva Mahotpale Ya

सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः॥Sa Me Shriyam Dishatu Sagara Sambhavayah

जैसे भ्रमरी बड़े नीलकमल पर मँडराती है, वैसे ही उनकी दृष्टियों की माला प्रेम और लज्जा के साथ बार-बार मुरारि के मुख पर आती-जाती है। समुद्र से प्रकट हुई देवी की वह दृष्टि मुझे समृद्धि दे।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम्Vishvamarendra Pada Vibhrama Dana Daksham

आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि।Ananda Heturadhikam Muravidvishopi

ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्Ishan Nishidatu Mayi Kshanam Ikshanardham

इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः॥Indivarodara Sahodaram Indirayah

जो दृष्टि देवताओं को इन्द्र पद का वैभव देने में समर्थ है और मुर के शत्रु विष्णु को भी अधिक आनंद देती है, नीलकमल के भीतरी भाग जैसी उस इन्दिरा की अर्ध-दृष्टि क्षण भर मुझ पर भी थोड़ी ठहरे।

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम्Amilitaksham Adhigamya Muda Mukundam

आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम्।Ananda Kandam Animesham Ananga Tantram

आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रंAkekara Sthita Kaninika Pakshma Netram

भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः॥Bhutyai Bhaven Mama Bhujanga Shayanganayah

अधमुँदी आँखों वाले, आनंद के मूल, प्रेम से भरे मुकुंद को आनंद से निहारती, बिना पलक झपकाए तिरछी चितवन में ठहरी पुतली और पलकों वाली, शेषशायी भगवान की प्रिया की वह आँख मेरी समृद्धि का कारण बने।

बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे याBahvantare Madhujitah Shrita Kaustubhe Ya

हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।Haravaliva Hari Neelamayi Vibhati

कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमालाKamaprada Bhagavatopi Kataksha Mala

कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः॥Kalyanam Avahatu Me Kamalalayayah

मधुसूदन के कौस्तुभ मणि वाले वक्ष पर जो कटाक्षों की माला इन्द्रनील मणियों के हार जैसी शोभित होती है, जो भगवान की भी कामनाएँ पूरी करती है, कमल में निवास करने वाली लक्ष्मी की वह कटाक्ष-माला मेरा कल्याण करे।

कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेःKalambudali Lalitorasi Kaitabhareh

धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव।Dharadhare Sphurati Ya Tadid Anganeva

मातुस्समस्तजगतां महनीयमूर्तिःMatus Samasta Jagatam Mahaniya Murtih

भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः॥Bhadrani Me Dishatu Bhargava Nandanayah

कैटभ के शत्रु विष्णु के काले मेघों जैसे सुंदर वक्ष पर जो बिजली की रेखा जैसी चमकती हैं, समस्त लोकों की माता, भृगु की पुत्री की वह पूजनीय मूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करे।

प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावात्Praptam Padam Prathamatah Khalu Yat Prabhavat

माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन।Mangalya Bhaji Madhumathini Manmathena

मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धंMayyapatet Tadiha Mantharam Ikshanardham

मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः॥Mandalasam Cha Makaralaya Kanyakayah

जिस दृष्टि के प्रभाव से कामदेव ने पहले-पहल मंगलमय मधुसूदन में स्थान पाया, समुद्र की पुत्री की वह धीमी, मंद और अलसाई अर्ध-दृष्टि यहाँ मुझ पर भी पड़े।

दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम्Dadyad Dayanupavano Dravinambu Dharam

अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे।Asminn Akinchana Vihanga Shishau Vishanne

दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरंDushkarma Gharmam Apaniya Chiraya Duram

नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः॥Narayana Pranayini Nayanambu Vahah

नारायण की प्रिया के नेत्र रूपी मेघ, दया की पवन से प्रेरित होकर, मुझ जैसे दुखी और निर्धन पक्षी-शिशु पर धन रूपी जल की धारा बरसाएँ और मेरे बुरे कर्मों की तपन को सदा के लिए दूर कर दें।

इष्टाविशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र-Ishta Vishishta Matayopi Yaya Dayardra

दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते।Drishtya Trivishtapa Padam Sulabham Labhante

दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टांDrishtih Prahrishta Kamalodara Diptir Ishtam

पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः॥Pushtim Krishishta Mama Pushkara Vishtarayah

जिनकी करुणा से भीगी दृष्टि से साधारण पुण्य वाले लोग भी सहज ही स्वर्ग पा लेते हैं, कमल के आसन वाली देवी की खिले कमल जैसी दीप्तिमान वह दृष्टि मुझे मनचाही पुष्टि दे।

गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीतिGirdevateti Garudadhvaja Sundariti

शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति।Shakambhariti Shashi Shekhara Vallabheti

सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायैSrishti Sthiti Pralaya Kelishu Samsthitayai

तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै॥Tasyai Namas Tribhuvanaika Guros Tarunyai

जिन्हें वाणी की देवी, गरुड़ध्वज विष्णु की सुंदरी, शाकंभरी और चंद्रशेखर शिव की प्रिया कहा जाता है, जो सृष्टि, पालन और प्रलय की लीला में स्थित हैं, तीनों लोकों के एकमात्र गुरु की उन युवा पत्नी को नमस्कार है।

श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यैShrutyai Namostu Shubha Karma Phala Prasutyai

रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै।Ratyai Namostu Ramaniya Gunarnavayai

शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायैShaktyai Namostu Shatapatra Niketanayai

पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै॥Pushtyai Namostu Purushottama Vallabhayai

शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति रूपा को नमस्कार। सुंदर गुणों की सागर रति रूपा को नमस्कार। शतदल कमल में रहने वाली शक्ति रूपा को नमस्कार। पुरुषोत्तम की प्रिया पुष्टि रूपा को नमस्कार।

नमोऽस्तु नालीकनिभाननायैNamostu Nalika Nibhananayai

नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै।Namostu Dugdhodadhi Janma Bhumyai

नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायैNamostu Somamrita Sodarayai

नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै॥Namostu Narayana Vallabhayai

कमल जैसे मुख वाली को नमस्कार। क्षीरसागर से प्रकट होने वाली को नमस्कार। चंद्रमा और अमृत की बहन को नमस्कार। नारायण की प्रिया को नमस्कार।

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानिSampatkarani Sakalendriya Nandanani

साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि।Samrajya Dana Vibhavani Saroruhakshi

त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानिTvad Vandanani Duritaharanodyatani

मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये॥Mameva Matar Anisham Kalayantu Manye

हे कमलनयनी, पूजनीय माता, आपकी वंदनाएँ संपत्ति देने वाली, सब इंद्रियों को आनंद देने वाली, साम्राज्य देने में समर्थ और पाप हरने को तत्पर हैं। वे सदा मेरे साथ रहें।

यत्कटाक्षसमुपासनाविधिःYat Kataksha Samupasana Vidhih

सेवकस्य सकलार्थसम्पदः।Sevakasya Sakalartha Sampadah

सन्तनोति वचनाङ्गमानसैःSantanoti Vachananga Manasaih

त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे॥Tvam Murari Hridayeshvarim Bhaje

जिनके कटाक्ष की उपासना सेवक को सब प्रकार की संपदा देती है, मुरारि के हृदय की स्वामिनी उन आपको मैं वाणी, शरीर और मन से भजता हूँ।

सरसिजनिलये सरोजहस्तेSarasija Nilaye Saroja Haste

धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे।Dhavalatamamshuka Gandha Malya Shobhe

भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञेBhagavati Hari Vallabhe Manogye

त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्॥Tribhuvana Bhutikari Prasida Mahyam

हे कमल में निवास करने वाली, हाथ में कमल धारण करने वाली, उज्ज्वल श्वेत वस्त्र, चंदन और मालाओं से सुशोभित, हे भगवती, हे हरिप्रिया, हे मनोहर, तीनों लोकों को ऐश्वर्य देने वाली, मुझ पर प्रसन्न होइए।

दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट-Digghastibhih Kanaka Kumbha Mukhavasrishta

स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम्।Svarvahini Vimala Charu Jala Plutangim

प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष-Pratar Namami Jagatam Jananim Ashesha

लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम्॥Lokadhinatha Grihinim Amritabdhi Putrim

दिशाओं के हाथी जिन पर सोने के कलशों से आकाशगंगा का निर्मल, सुंदर जल डालते हैं, उन जगत की जननी, समस्त लोकों के स्वामी की गृहिणी, अमृत सागर की पुत्री को मैं प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वंKamale Kamalaksha Vallabhe Tvam

करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः।Karuna Pura Tarangitair Apangaih

अवलोकय मामकिञ्चनानांAvalokaya Mam Akinchananam

प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः॥Prathamam Patram Akritrimam Dayayah

हे कमला, कमलनयन प्रभु की प्रिया, करुणा की बाढ़ से लहराती अपनी चितवनों से मुझे देखिए। मैं निर्धनों में पहला हूँ, इसलिए आपकी दया का सबसे स्वाभाविक पात्र हूँ।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहंStuvanti Ye Stutibhir Amubhir Anvaham

त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।Trayimayim Tribhuvana Mataram Ramam

गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनोGunadhika Gurutara Bhagya Bhagino

भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः॥Bhavanti Te Bhuvi Budha Bhavitashayah

जो लोग इन स्तुतियों से प्रतिदिन तीनों वेदों की स्वरूपा, तीनों लोकों की माता रमा की स्तुति करते हैं, वे गुणों में श्रेष्ठ, महान सौभाग्य के भागी होते हैं और पृथ्वी पर विद्वान उनका आदर करते हैं।

सुवर्णधारास्तोत्रं यच्छङ्कराचार्यनिर्मितम्।Suvarnadhara Stotram Yacchankaracharya Nirmitam

त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं स कुबेरसमो भवेत्॥Trisandhyam Yah Pathen Nityam Sa Kubera Samo Bhavet

शंकराचार्य द्वारा रचित इस स्वर्णधारा स्तोत्र का जो प्रतिदिन तीनों संध्याओं में पाठ करता है, वह कुबेर के समान हो जाता है।

पूर्ण

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प्रश्न

कनकधारा स्तोत्र की कथा क्या है?

परंपरा के अनुसार बालक शंकर भिक्षा माँगते हुए एक बहुत निर्धन घर पहुँचे, जहाँ स्त्री के पास देने को केवल एक आँवला था। शंकर ने लक्ष्मी जी की यह स्तुति गाई और उस घर पर सोने के आँवले बरसे। इसी से नाम पड़ा: कनकधारा, सोने की धारा।

कनकधारा स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?

मानक पाठ में १८ श्लोक हैं, फिर एक छोटा फलश्रुति श्लोक। कुछ छपी पुस्तकें सात तक और श्लोक जोड़ती हैं, इसलिए कहीं २१ या २५ श्लोक भी दिखते हैं। इस पृष्ठ पर १८ श्लोक और फलश्रुति है।

क्या दीपावली की रात लक्ष्मी पूजन के बाद कनकधारा स्तोत्र पढ़ सकते हैं?

हाँ। दीपावली, धनतेरस और अक्षय तृतीया पर यह सबसे प्रचलित लक्ष्मी स्तोत्रों में है, जो पूजन के बाद, आरती से पहले या बाद में पढ़ा जाता है। इसमें लगभग आठ मिनट लगते हैं।

क्या कनकधारा स्तोत्र से दरिद्रता दूर होती है?

परंपरा कहती है कि इससे लक्ष्मी जी की कृपा और अभाव से मुक्ति मिलती है, और अंतिम श्लोक पाठ करने वाले को कुबेर समान बताता है। ये श्रद्धा की बातें हैं। स्तोत्र मुख्य रूप से करुणा की प्रार्थना है, और इसकी कथा एक निर्धन स्त्री की उदारता की है।

स्रोत और समीक्षा

स्रोत: Kanakadhara Stotram, sanskritdocuments.org kanaka.itx (encoded and proofread by P. P. Narayanaswami and Kirk Wortman; verse order as in the Complete Works of Shankaracharya, vol. 18, p. 70); cross-checked line by line with "Prabhata Stotranidhi" (stotranidhi.com, Devanagari)

18 verses, the count and order shared by both sources, plus the phala verse "सुवर्णधारास्तोत्रं यच्छङ्कराचार्यनिर्मितम्" that many books print after verse 18. Left out: the opening Ganesha verse "वन्दे वन्दारुमन्दारम्" (sanskritdocuments only) and the extra verses that both sources mark as additions ("नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायै", "नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै", "नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै", "देवि प्रसीद जगदीश्वरि", "बिल्वाटवीमध्यलसत्सरोजे", "कमलासनपाणिना ललाटे", "अम्भोरुहं जन्मगृहं भवत्याः"). Readings where the sources differ: v1 "माङ्गल्यदास्तु" (stotranidhi; sanskritdocuments "माङ्गल्यदाऽस्तु", same sound); v2 "माला दृशोः" spaced (stotranidhi joins it); v3 "ईक्षणार्धम्" (sanskritdocuments; stotranidhi "ईक्षणार्थम्"); v6 "तडिदङ्गनेव" (sanskritdocuments; stotranidhi "तटिदङ्गनेव"); v8 "अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ" (sanskritdocuments; stotranidhi divides "अस्मिन्न किञ्चन"); v16 "दिग्घस्तिभिः" (stotranidhi; sanskritdocuments "दिग् हस्तिभिः"); v18 "अमूभिः" (stotranidhi; sanskritdocuments "अमीभिः") and "भाग्यभागिनो" (sanskritdocuments; stotranidhi "भाग्यभाजिनो"). Where a compound runs across a line, stotranidhi uses hyphens with sandhi ("दक्ष- / -मानन्द"); we follow sanskritdocuments and write the words in full at the line break ("दक्षम् / आनन्द"), keeping a hyphen only inside a compound (v9, v16). Variants noted by sanskritdocuments: "गरुडध्वजभामिनीति" (v10), "सरोरुहाणि" (v13), "दुरितोत्तरणोद्यतानि" / "दुरितोद्धरणोद्यतानि" (v13). The attribution to Adi Shankaracharya is traditional.

मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।

ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।

त्रुटि बताएँ अंतिम अद्यतन 2026-10-03

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