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Nityaनित्य

श्री शनि चालीसा

Shani Chalisa

श्री शनि चालीसा सूर्यपुत्र शनिदेव की पारंपरिक हिंदी स्तुति है। इसके ४३ पदों (आरंभ के दो दोहे, ४० चौपाइयाँ और अंत का एक दोहा) में शनिदेव के रूप का वर्णन है, यह याद किया गया है कि श्रीराम, हरिश्चंद्र और पाण्डवों तक ने कठिन समय देखा, और उनसे कृपा की प्रार्थना है। भक्त इसका पाठ शनिवार को, अक्सर तिल के तेल का दीपक जलाकर, करते हैं।

दोहा १

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।

दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥

हे गिरिजा के पुत्र, मंगल करने वाले कृपालु गणेश जी, आपकी जय हो। हे नाथ, दीन-दुखियों के दुख दूर करके उन्हें प्रसन्न कर दीजिए।

दोहा २

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।

करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

हे प्रभु श्री शनिदेव, आपकी जय हो, जय हो। हे महाराज, मेरी विनती सुनिए। हे सूर्यपुत्र, कृपा कीजिए और अपने भक्त की लाज रखिए।

चौपाई १

जयति जयति शनिदेव दयाला।

करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥

दयालु शनिदेव की जय हो, जय हो, जो सदा अपने भक्तों का पालन करते हैं।

चौपाई २

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै।

माथे रतन मुकुट छबि छाजै॥

आपकी चार भुजाएँ हैं और श्याम वर्ण का शरीर शोभा पाता है। माथे पर रत्नों का मुकुट सुंदर लगता है।

चौपाई ३

परम विशाल मनोहर भाला।

टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥

आपका ललाट बहुत विशाल और मनोहर है। आपकी दृष्टि तिरछी है और भौंहें विकराल हैं।

चौपाई ४

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके।

हिये माल मुक्तन मणि दमकै॥

कानों में कुंडल चमाचम चमकते हैं और हृदय पर मोतियों और मणियों की माला दमकती है।

चौपाई ५

कर में गदा त्रिशूल कुठारा।

पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥

आपके हाथों में गदा, त्रिशूल और फरसा है, जिनसे आप पल भर में शत्रु का संहार कर देते हैं।

चौपाई ६

पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन।

यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन॥

पिंगल, कृष्ण, छायानंदन, यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन,

चौपाई ७

सौरी, मन्द, शनी, दश नामा।

भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥

सौरि, मंद और शनि: ये आपके दस नाम हैं। सूर्यपुत्र की पूजा करने वालों के सब काम पूरे होते हैं।

चौपाई ८

जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं।

रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥

प्रभु जिस पर प्रसन्न हो जाते हैं, उस कंगाल को भी क्षण भर में राजा बना देते हैं।

चौपाई ९

पर्वतहू तृण होइ निहारत।

तृणहू को पर्वत करि डारत॥

उनके देखते ही पर्वत भी तिनका हो जाता है, और तिनके को वे पर्वत बना देते हैं।

चौपाई १०

राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो।

कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥

राज्य मिलते-मिलते श्रीराम को वनवास मिल गया, और कैकेयी की बुद्धि भी हर ली गई।

चौपाई ११

बनहूँ में मृग कपट दिखाई।

मातु जानकी गई चुराई॥

वन में भी कपट का मृग दिखाई दिया और माता जानकी का हरण हो गया।

चौपाई १२

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा।

मचिगा दल में हाहाकारा॥

शक्ति-बाण ने लक्ष्मण जी को व्याकुल कर दिया और सेना में हाहाकार मच गया।

चौपाई १३

रावण की गति-मति बौराई।

रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥

रावण की बुद्धि भ्रष्ट हो गई और उसने श्रीरामचंद्र से वैर बढ़ा लिया।

चौपाई १४

दियो कीट करि कंचन लंका।

बजि बजरंग बीर की डंका॥

सोने की लंका मिट्टी हो गई और वीर बजरंगबली का डंका बज गया।

चौपाई १५

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा।

चित्र मयूर निगलि गै हारा॥

जब आपने राजा विक्रम पर पाँव रखा, तो चित्र का मोर हार निगल गया।

चौपाई १६

हार नौलखा लाग्यो चोरी।

हाथ पैर डरवायो तोरी॥

नौलखा हार की चोरी का आरोप उन पर लगा और उनके हाथ-पैर तुड़वा दिए गए।

चौपाई १७

भारी दशा निकृष्ट दिखायो।

तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥

आपने उन्हें बहुत भारी और नीच दशा दिखाई, और तेली के घर कोल्हू चलवाया।

चौपाई १८

विनय राग दीपक महँ कीन्हयों।

तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥

जब उन्होंने दीपक राग में विनती की, तब प्रभु प्रसन्न हुए और उन्हें सुख दिया।

चौपाई १९

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी।

आपहुं भरे डोम घर पानी॥

राजा हरिश्चंद्र की पत्नी बिक गई और वे स्वयं डोम के घर पानी भरने लगे।

चौपाई २०

तैसे नल पर दशा सिरानी।

भूंजी-मीन कूद गई पानी॥

वैसे ही राजा नल पर भी कठिन दशा आई, यहाँ तक कि भुनी हुई मछली भी पानी में कूद गई।

चौपाई २१

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई।

पारवती को सती कराई॥

जब इसने जाकर श्री शंकर जी को भी पकड़ा, तो पार्वती जी को (सती रूप में) अग्नि में देह त्यागनी पड़ी।

चौपाई २२

तनिक विलोकत ही करि रीसा।

नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥

रोष में तनिक-सा देखते ही गौरी-पुत्र गणेश का सिर आकाश में उड़ गया।

चौपाई २३

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी।

बची द्रौपदी होति उघारी॥

जब पाण्डवों पर आपकी दशा आई, तो द्रौपदी निर्वस्त्र होते-होते बचीं।

चौपाई २४

कौरव के भी गति मति मारयो।

युद्ध महाभारत करि डारयो॥

आपने कौरवों की भी बुद्धि हर ली और महाभारत का युद्ध करवा दिया।

चौपाई २५

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला।

लेकर कूदि परयो पाताला॥

तत्काल सूर्य को मुख में धरकर कोई कूदकर पाताल में जा पहुँचा।

चौपाई २६

शेष देव लखि विनती लाई।

रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥

यह देखकर शेषनाग ने विनती की, और सूर्य को मुख से छुड़ा दिया गया।

चौपाई २७

वाहन प्रभु के सात सुजाना।

जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥

हे सुजनो, प्रभु के सात वाहन हैं: हाथी, गधा, हिरण, कुत्ता,

चौपाई २८

जम्बुक सिंह आदि नख धारी।

सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥

सियार, सिंह और अन्य नख वाले पशु। इनका फल ज्योतिष पुकारकर बताता है।

चौपाई २९

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।

हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं॥

हाथी पर आएँ तो घर में लक्ष्मी आती हैं; घोड़े पर आएँ तो सुख-संपत्ति बढ़ाते हैं।

चौपाई ३०

गर्दभ हानि करै बहु काजा।

सिंह सिद्धकर राज समाजा॥

गधे पर आएँ तो बहुत-से कामों में हानि होती है; सिंह पर आएँ तो राज और समाज में सफलता देते हैं।

चौपाई ३१

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै।

मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥

सियार पर आएँ तो बुद्धि नष्ट करते हैं; हिरण पर आएँ तो कष्ट देकर प्राणों पर संकट लाते हैं।

चौपाई ३२

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।

चोरी आदि होय डर भारी॥

जब प्रभु कुत्ते की सवारी पर आते हैं, तो चोरी आदि का भारी डर रहता है।

चौपाई ३३

तैसहि चारि चरण यह नामा।

स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥

इसी तरह चार चरण (पाये) हैं, जिनके नाम हैं: सोना, लोहा, चाँदी और ताँबा।

चौपाई ३४

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं।

धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥

जब प्रभु लोहे के पाये पर आते हैं, तो धन, परिवार और संपत्ति की हानि कराते हैं।

चौपाई ३५

समता ताम्र रजत शुभकारी।

स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी॥

ताँबे का पाया समता देता है, चाँदी का शुभ फल, और सोने का पाया सब सुख और बड़ा मंगल देता है।

चौपाई ३६

जो यह शनि चरित्र नित गावै।

कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥

जो शनिदेव का यह चरित्र रोज़ गाता है, उसे बुरी दशा कभी नहीं सताती।

चौपाई ३७

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।

करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥

प्रभु अद्भुत लीला दिखाते हैं और शत्रु का बल नष्ट करके ढीला कर देते हैं।

चौपाई ३८

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई।

विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥

जो योग्य पंडित को बुलाकर विधि-विधान से शनि ग्रह की शांति कराता है,

चौपाई ३९

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत।

दीप दान दै बहु सुख पावत॥

और शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाकर दीपदान करता है, वह बहुत सुख पाता है।

चौपाई ४०

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।

शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥

प्रभु के दास रामसुंदर कहते हैं: शनिदेव का स्मरण करने से सुख का प्रकाश होता है।

समापन दोहा

पाठ शनिश्चर देव को, कीन्हों विमल तैयार।

करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

शनिश्चर देव का यह पाठ विमल ने तैयार किया। चालीस दिन इसका पाठ करने से मनुष्य भवसागर पार हो जाता है।

स्रोत: Traditional Hindi text, cross-checked line by line against sanskritdocuments.org (doc_z_otherlang_hindi/shani40, navagraha section), Bharat Discovery / Bharatkosh (शनि चालीसा), BhaktiBharat.com (chalisa/shani-chalisa) and Amar Ujala (shani-chalisa-lyrics-in-hindi)

ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।

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