श्री शनि चालीसा
Shani Chalisa
श्री शनि चालीसा सूर्यपुत्र शनिदेव की पारंपरिक हिंदी स्तुति है। इसके ४३ पदों (आरंभ के दो दोहे, ४० चौपाइयाँ और अंत का एक दोहा) में शनिदेव के रूप का वर्णन है, यह याद किया गया है कि श्रीराम, हरिश्चंद्र और पाण्डवों तक ने कठिन समय देखा, और उनसे कृपा की प्रार्थना है। भक्त इसका पाठ शनिवार को, अक्सर तिल के तेल का दीपक जलाकर, करते हैं।
- 43 पद
- 8 मिनट
- पारंपरिक; अंतिम चौपाई में राम सुन्दर का नाम
- उत्तम दिन: शनिवार
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।Jai Ganesh Girija Suvan, Mangal Karan Kripal
दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥Deenan Ke Dukh Door Kari, Keejai Nath Nihal
हे गिरिजा के पुत्र, मंगल करने वाले कृपालु गणेश जी, आपकी जय हो। हे नाथ, दीन-दुखियों के दुख दूर करके उन्हें प्रसन्न कर दीजिए।
अधिकतर चालीसाओं की तरह यह भी गणेश जी के स्मरण से शुरू होती है। शिव चालीसा का पहला चरण भी यही है, आगे पाठ अलग है।
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।Jai Jai Shri Shanidev Prabhu, Sunahu Vinay Maharaj
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥Karahu Kripa He Ravi Tanay, Rakhahu Jan Ki Laj
हे प्रभु श्री शनिदेव, आपकी जय हो, जय हो। हे महाराज, मेरी विनती सुनिए। हे सूर्यपुत्र, कृपा कीजिए और अपने भक्त की लाज रखिए।
जयति जयति शनिदेव दयाला।Jayati Jayati Shanidev Dayala
करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥Karat Sada Bhaktan Pratipala
दयालु शनिदेव की जय हो, जय हो, जो सदा अपने भक्तों का पालन करते हैं।
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै।Chari Bhuja, Tanu Shyam Virajai
माथे रतन मुकुट छबि छाजै॥Mathe Ratan Mukut Chhabi Chhajai
आपकी चार भुजाएँ हैं और श्याम वर्ण का शरीर शोभा पाता है। माथे पर रत्नों का मुकुट सुंदर लगता है।
परम विशाल मनोहर भाला।Param Vishal Manohar Bhala
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥Tedhi Drishti Bhrikuti Vikrala
आपका ललाट बहुत विशाल और मनोहर है। आपकी दृष्टि तिरछी है और भौंहें विकराल हैं।
शनिदेव की वक्र या नीची दृष्टि उनके वर्णन की पहचान है; दशरथकृत स्तोत्र में भी उन्हें "अधोदृष्टि" कहा गया है।
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके।Kundal Shravan Chamacham Chamke
हिये माल मुक्तन मणि दमकै॥Hiye Mal Muktan Mani Damkai
कानों में कुंडल चमाचम चमकते हैं और हृदय पर मोतियों और मणियों की माला दमकती है।
भक्ति भारत और अमर उजाला में "हिय माल … दमके" छपा है।
कर में गदा त्रिशूल कुठारा।Kar Mein Gada Trishul Kuthara
पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥Pal Bich Karain Arihin Samhara
आपके हाथों में गदा, त्रिशूल और फरसा है, जिनसे आप पल भर में शत्रु का संहार कर देते हैं।
पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन।Pingal, Krishno, Chhaya Nandan
यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन॥Yam, Konasth, Raudra, Dukhbhanjan
पिंगल, कृष्ण, छायानंदन, यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन,
यह और अगली चौपाई शनिदेव के दस नाम गिनाती हैं। ब्रह्माण्डपुराण के शनैश्चर स्तोत्र ("कोणोऽन्तको रौद्रयमोऽथ बभ्रुः…") के अंत में भी ऐसे ही दस नाम आते हैं।
सौरी, मन्द, शनी, दश नामा।Sauri, Mand, Shani, Dash Nama
भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥Bhanu Putra Poojahin Sab Kama
सौरि, मंद और शनि: ये आपके दस नाम हैं। सूर्यपुत्र की पूजा करने वालों के सब काम पूरे होते हैं।
जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं।Ja Par Prabhu Prasanna Hvain Jahin
रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥Rankahun Rav Karain Kshan Mahin
प्रभु जिस पर प्रसन्न हो जाते हैं, उस कंगाल को भी क्षण भर में राजा बना देते हैं।
पर्वतहू तृण होइ निहारत।Parvatahu Trin Hoi Niharat
तृणहू को पर्वत करि डारत॥Trinahu Ko Parvat Kari Darat
उनके देखते ही पर्वत भी तिनका हो जाता है, और तिनके को वे पर्वत बना देते हैं।
राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो।Raj Milat Ban Ramahin Deenhyo
कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥Kaikeihun Ki Mati Hari Leenhyo
राज्य मिलते-मिलते श्रीराम को वनवास मिल गया, और कैकेयी की बुद्धि भी हर ली गई।
यहाँ से चौपाई २४ तक चालीसा महान पात्रों के जीवन के कठिन समय को याद करती है, जिसे कवि शनि के प्रभाव के रूप में देखते हैं।
बनहूँ में मृग कपट दिखाई।Banahun Mein Mrig Kapat Dikhai
मातु जानकी गई चुराई॥Matu Janaki Gai Churai
वन में भी कपट का मृग दिखाई दिया और माता जानकी का हरण हो गया।
लखनहिं शक्ति विकल करिडारा।Lakhanahin Shakti Vikal Kari Dara
मचिगा दल में हाहाकारा॥Machiga Dal Mein Hahakara
शक्ति-बाण ने लक्ष्मण जी को व्याकुल कर दिया और सेना में हाहाकार मच गया।
sanskritdocuments.org और भारतकोश में पुरानी वर्तनी "लषणहिं" छपी है।
रावण की गति-मति बौराई।Ravan Ki Gati Mati Baurai
रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥Ramchandra Son Bair Badhai
रावण की बुद्धि भ्रष्ट हो गई और उसने श्रीरामचंद्र से वैर बढ़ा लिया।
दियो कीट करि कंचन लंका।Diyo Keet Kari Kanchan Lanka
बजि बजरंग बीर की डंका॥Baji Bajrang Beer Ki Danka
सोने की लंका मिट्टी हो गई और वीर बजरंगबली का डंका बज गया।
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा।Nrip Vikram Par Tuhi Pagu Dhara
चित्र मयूर निगलि गै हारा॥Chitra Mayur Nigali Gai Hara
जब आपने राजा विक्रम पर पाँव रखा, तो चित्र का मोर हार निगल गया।
चौपाई १५ से १८ राजा विक्रमादित्य और शनिदेव की प्रचलित कथा कहती हैं: हार की चोरी का झूठा आरोप, हाथ-पैर कटना, तेली के घर कोल्हू चलाना, और अंत में दीपक राग गाने पर शनिदेव का प्रसन्न होना।
हार नौलखा लाग्यो चोरी।Har Naulakha Lagyo Chori
हाथ पैर डरवायो तोरी॥Hath Pair Darvayo Tori
नौलखा हार की चोरी का आरोप उन पर लगा और उनके हाथ-पैर तुड़वा दिए गए।
भक्ति भारत में "डरवाय" है; बाकी तीन स्रोतों में "डरवायो", जो छंद में भी ठीक बैठता है।
भारी दशा निकृष्ट दिखायो।Bhari Dasha Nikrisht Dikhayo
तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥Telihin Ghar Kolhu Chalvayo
आपने उन्हें बहुत भारी और नीच दशा दिखाई, और तेली के घर कोल्हू चलवाया।
sanskritdocuments.org और भारतकोश में "तेलहिं" है; हमने भक्ति भारत और अमर उजाला का "तेलिहिं" (तेली के घर) रखा है, जो कथा से मेल खाता है।
विनय राग दीपक महँ कीन्हयों।Vinay Rag Deepak Mahan Keenhyon
तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥Tab Prasanna Prabhu Hvai Sukh Deenhyon
जब उन्होंने दीपक राग में विनती की, तब प्रभु प्रसन्न हुए और उन्हें सुख दिया।
हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी।Harishchandra Nrip Nari Bikani
आपहुं भरे डोम घर पानी॥Apahun Bhare Dom Ghar Pani
राजा हरिश्चंद्र की पत्नी बिक गई और वे स्वयं डोम के घर पानी भरने लगे।
तैसे नल पर दशा सिरानी।Taise Nal Par Dasha Sirani
भूंजी-मीन कूद गई पानी॥Bhunji Meen Kood Gai Pani
वैसे ही राजा नल पर भी कठिन दशा आई, यहाँ तक कि भुनी हुई मछली भी पानी में कूद गई।
श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई।Shri Shankarahin Gahyo Jab Jai
पारवती को सती कराई॥Paravati Ko Sati Karai
जब इसने जाकर श्री शंकर जी को भी पकड़ा, तो पार्वती जी को (सती रूप में) अग्नि में देह त्यागनी पड़ी।
पार्वती जी पूर्व जन्म में सती थीं, जिन्होंने पिता दक्ष के यज्ञ में देह त्याग दी थी।
तनिक विलोकत ही करि रीसा।Tanik Vilokat Hi Kari Reesa
नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥Nabh Udi Gayo Gaurisut Seesa
रोष में तनिक-सा देखते ही गौरी-पुत्र गणेश का सिर आकाश में उड़ गया।
यह ब्रह्मवैवर्तपुराण की कथा पर आधारित है, जिसमें शनिदेव नीची दृष्टि रखते थे और पार्वती जी के आग्रह पर ही उन्होंने बालक गणेश को देखा। अन्य पुराणों में यह कथा अलग है।
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी।Pandav Par Bhai Dasha Tumhari
बची द्रौपदी होति उघारी॥Bachi Draupadi Hoti Ughari
जब पाण्डवों पर आपकी दशा आई, तो द्रौपदी निर्वस्त्र होते-होते बचीं।
कौरव के भी गति मति मारयो।Kaurav Ke Bhi Gati Mati Maryo
युद्ध महाभारत करि डारयो॥Yuddh Mahabharat Kari Daryo
आपने कौरवों की भी बुद्धि हर ली और महाभारत का युद्ध करवा दिया।
रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला।Ravi Kahan Mukh Mahan Dhari Tatkala
लेकर कूदि परयो पाताला॥Lekar Koodi Paryo Patala
तत्काल सूर्य को मुख में धरकर कोई कूदकर पाताल में जा पहुँचा।
चौपाई में यह नहीं कहा गया कि मुख किसका था; चौपाई २५ और २६ की व्याख्या अलग-अलग पुस्तकों में अलग है।
शेष देव लखि विनती लाई।Shesh Dev Lakhi Vinati Lai
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥Ravi Ko Mukh Te Diyo Chhudai
यह देखकर शेषनाग ने विनती की, और सूर्य को मुख से छुड़ा दिया गया।
sanskritdocuments.org और भारतकोश में "शेष देव- लखि विनति लाई" छपा है।
वाहन प्रभु के सात सुजाना।Vahan Prabhu Ke Sat Sujana
जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥Jag Diggaj Gardabh Mrig Swana
हे सुजनो, प्रभु के सात वाहन हैं: हाथी, गधा, हिरण, कुत्ता,
चौपाई २७ से ३५ में शनिदेव के वाहन और चरण (पाया) के बारे में ज्योतिष की मान्यताएँ हैं। हम इन्हें पाठ के अंश के रूप में देते हैं; नित्य कोई भविष्यवाणी नहीं करता। भक्ति भारत में "सात सजाना" है।
जम्बुक सिंह आदि नख धारी।Jambuk Singh Adi Nakh Dhari
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥So Phal Jyotish Kahat Pukari
सियार, सिंह और अन्य नख वाले पशु। इनका फल ज्योतिष पुकारकर बताता है।
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।Gaj Vahan Lakshmi Grih Avain
हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं॥Hay Te Sukh Sampatti Upajavain
हाथी पर आएँ तो घर में लक्ष्मी आती हैं; घोड़े पर आएँ तो सुख-संपत्ति बढ़ाते हैं।
गर्दभ हानि करै बहु काजा।Gardabh Hani Karai Bahu Kaja
सिंह सिद्धकर राज समाजा॥Singh Siddhkar Raj Samaja
गधे पर आएँ तो बहुत-से कामों में हानि होती है; सिंह पर आएँ तो राज और समाज में सफलता देते हैं।
जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै।Jambuk Buddhi Nasht Kar Darai
मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥Mrig De Kasht Pran Samharai
सियार पर आएँ तो बुद्धि नष्ट करते हैं; हिरण पर आएँ तो कष्ट देकर प्राणों पर संकट लाते हैं।
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।Jab Avahin Prabhu Swan Savari
चोरी आदि होय डर भारी॥Chori Adi Hoy Dar Bhari
जब प्रभु कुत्ते की सवारी पर आते हैं, तो चोरी आदि का भारी डर रहता है।
तैसहि चारि चरण यह नामा।Taisahi Chari Charan Yah Nama
स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥Swarn Lauh Chandi Aru Tama
इसी तरह चार चरण (पाये) हैं, जिनके नाम हैं: सोना, लोहा, चाँदी और ताँबा।
ज्योतिष में शनि के समय के "पाये" का नाम इन चार धातुओं में से किसी एक पर रखा जाता है।
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं।Lauh Charan Par Jab Prabhu Avain
धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥Dhan Jan Sampatti Nasht Karavain
जब प्रभु लोहे के पाये पर आते हैं, तो धन, परिवार और संपत्ति की हानि कराते हैं।
समता ताम्र रजत शुभकारी।Samata Tamra Rajat Shubhkari
स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी॥Swarn Sarv Sukh Mangal Bhari
ताँबे का पाया समता देता है, चाँदी का शुभ फल, और सोने का पाया सब सुख और बड़ा मंगल देता है।
भक्ति भारत और अमर उजाला में "स्वर्ण सर्व सर्व सुख" है; दोहराया शब्द सोलह मात्रा का छंद तोड़ता है, इसलिए हमने sanskritdocuments.org का पाठ रखा है।
जो यह शनि चरित्र नित गावै।Jo Yah Shani Charitra Nit Gavai
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥Kabahun Na Dasha Nikrisht Satavai
जो शनिदेव का यह चरित्र रोज़ गाता है, उसे बुरी दशा कभी नहीं सताती।
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।Adbhut Nath Dikhavain Leela
करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥Karain Shatru Ke Nashi Bali Dheela
प्रभु अद्भुत लीला दिखाते हैं और शत्रु का बल नष्ट करके ढीला कर देते हैं।
sanskritdocuments.org और भारतकोश में "नशिब" है; हमने भक्ति भारत और अमर उजाला का "नशि" रखा है।
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई।Jo Pandit Suyogya Bulvai
विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥Vidhivat Shani Grah Shanti Karai
जो योग्य पंडित को बुलाकर विधि-विधान से शनि ग्रह की शांति कराता है,
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत।Peepal Jal Shani Divas Chadhavat
दीप दान दै बहु सुख पावत॥Deep Daan Dai Bahu Sukh Pavat
और शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाकर दीपदान करता है, वह बहुत सुख पाता है।
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।Kahat Ram Sundar Prabhu Dasa
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥Shani Sumirat Sukh Hot Prakasha
प्रभु के दास रामसुंदर कहते हैं: शनिदेव का स्मरण करने से सुख का प्रकाश होता है।
अधिकतर लोग "राम सुन्दर" को कवि का नाम मानते हैं, जैसा कवि अंतिम चौपाई में देते थे। उनके बारे में भरोसेमंद जानकारी नहीं मिलती।
पाठ शनिश्चर देव को, कीन्हों विमल तैयार।Path Shanishchar Dev Ko, Keenhon Vimal Taiyar
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥Karat Path Chalis Din, Ho Bhavsagar Par
शनिश्चर देव का यह पाठ विमल ने तैयार किया। चालीस दिन इसका पाठ करने से मनुष्य भवसागर पार हो जाता है।
sanskritdocuments.org और भारतकोश में 'विमल' उद्धरण चिह्नों में है, जिसे नाम माना जाता है। भक्ति भारत और अमर उजाला में "की हों 'भक्त' तैयार" है। sanskritdocuments.org में आगे एक दोहा और है, जो दशरथकृत स्तोत्र के हिंदी रूप की भूमिका है; उसे हमने यहाँ नहीं रखा।
पूर्ण
श्री शनि चालीसा का पाठ पूर्ण हुआ।
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प्रश्न
शनि चालीसा का पाठ कब करें?
शनिवार शनिदेव का दिन है, इसलिए ज़्यादातर लोग शनिवार को, अक्सर तिल के तेल का दीपक जलाकर, इसका पाठ करते हैं। शनि जयंती, शनि अमावस्या (शनिवार को पड़ने वाली अमावस्या) और साढ़ेसाती के समय भी बहुत लोग इसे पढ़ते हैं। कुछ लोग अंतिम दोहे के अनुसार चालीस दिन रोज़ पाठ करते हैं।
क्या शनिवार शाम को पाठ कर सकते हैं?
हाँ। शनिवार की शाम, सूर्यास्त के आसपास दीपक जलाकर, पाठ का सबसे प्रचलित समय है। बहुत से परिवार शनि या हनुमान मंदिर जाकर, या पीपल के नीचे दीपक जलाकर, वहीं पाठ करते हैं।
साढ़ेसाती क्या होती है?
ज्योतिष में साढ़ेसाती लगभग साढ़े सात वर्ष का वह समय है, जब शनि आपकी चंद्र राशि से पहले वाली राशि, आपकी चंद्र राशि और उसके बाद वाली राशि से गुज़रता है, हर राशि में करीब ढाई वर्ष। शनि को राशिचक्र का एक चक्कर पूरा करने में लगभग तीस वर्ष लगते हैं, इसलिए ज़्यादातर लोगों के जीवन में यह दो-तीन बार आती है। परंपरा इसे धैर्य, ईमानदार मेहनत और प्रार्थना का समय मानती है, और बहुत लोग इस दौरान शनि चालीसा या हनुमान चालीसा पढ़ते हैं। शनिदेव की प्रार्थना के लिए कुछ खरीदने या पैसे देकर अनुष्ठान कराने की ज़रूरत नहीं है।
शनि चालीसा किसने लिखी?
यह पारंपरिक हिंदी चालीसा है। अंतिम चौपाई में "राम सुन्दर" का नाम है, जिन्हें ज़्यादातर लोग कवि मानते हैं, और कुछ पुस्तकों के अंतिम दोहे में "विमल" का नाम आता है। दोनों के बारे में भरोसेमंद जानकारी नहीं है।
पाठ में कितना समय लगता है?
आराम से पढ़ें तो लगभग आठ मिनट।
स्रोत और समीक्षा
स्रोत: Traditional Hindi text, cross-checked line by line against sanskritdocuments.org (doc_z_otherlang_hindi/shani40, navagraha section), Bharat Discovery / Bharatkosh (शनि चालीसा), BhaktiBharat.com (chalisa/shani-chalisa) and Amar Ujala (shani-chalisa-lyrics-in-hindi)
The four sources fall into two families: sanskritdocuments.org and Bharat Discovery share one text; BhaktiBharat and Amar Ujala share another. Our base is the sanskritdocuments.org text with obvious slips corrected from the other family (हवैं → ह्वैं, क्शण → क्षण, वोलोकत → विलोकत, अद्भूत → अद्भुत, लक्श्मी → लक्ष्मी, चाँदि → चाँदी, जनकी → जन की, नौंलखा → नौलखा, तुहिं → तुहि). Readings taken from BhaktiBharat/Amar Ujala: लखनहिं (ch. 12), तेलिहिं (ch. 17), भरे (ch. 19), विनती (ch. 26), नशि (ch. 37), तैयार (closing doha). Readings kept from sanskritdocuments.org against the other family: हिये … दमकै (ch. 4), डरवायो (ch. 16), सुजाना (ch. 27, BhaktiBharat 'सजाना'), सम्पत्ति (ch. 29), 'स्वर्ण सर्व सुख' (ch. 35, the other family repeats 'सर्व'), 'कीन्हों विमल' (closing doha, the other family 'की हों भक्त'). shubhpanchang.com prints a very different, shorter text that does not match any of these sources, so we did not use it. Not yet compared with a Gita Press printing.
मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।
ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।
मुख्य तथ्य
- रचयिता
- पारंपरिक; अंतिम चौपाई में राम सुन्दर का नाम
- श्लोक / पद
- 43
- मूल भाषा
- हिन्दी
- स्रोत संस्करण
- Traditional Hindi text, cross-checked line by line against sanskritdocuments.org (doc_z_otherlang_hindi/shani40, navagraha section), Bharat Discovery / Bharatkosh (शनि चालीसा), BhaktiBharat.com (chalisa/shani-chalisa) and Amar Ujala (shani-chalisa-lyrics-in-hindi)
- आख़िरी जाँच
- समीक्षा की स्थिति
- लिपि सत्यापित
इस पन्ने का संदर्भ दें
“श्री शनि चालीसा”. Nitya, अद्यतन 2026-10-04. https://getnitya.com/hi/shani/shani-chalisa/