शनिदेव
శనిదేవుడుசனி பகவான்Shani Dev
अन्य नाम: Shani · Shanidev · Shanaishchara · Shanishchar · Shaneeswaran · Sani Bhagavan · Shani Maharaj · Sauri · Manda · Chhaya Putra · Ravi Nandan · Konastha
शनिदेव सूर्यदेव और छाया के पुत्र हैं और नवग्रहों में शनि ग्रह के अधिष्ठाता हैं। परंपरा उन्हें न्याय करने वाले कर्मफलदाता के रूप में पूजती है, जो हर व्यक्ति को उसके अपने कर्मों का फल देते हैं। भक्त शनिवार को तिल के तेल का दीपक जलाकर, काले तिल और उड़द चढ़ाकर उनकी पूजा करते हैं।
- पूजा का दिन
- शनिवार
शनिदेव के पाठ
कथा
पुराणों के अनुसार शनिदेव सूर्यदेव और छाया के पुत्र हैं। छाया संज्ञा की छाया-रूप थीं, जो उनके स्थान पर रहीं। धर्मराज यम और यमुना जी उनके भाई-बहन हैं। शनिदेव का वर्ण श्याम है, वे नीले या काले वस्त्र पहनते हैं और उनका वाहन कौआ है, कहीं-कहीं गिद्ध भी। 'शनैश्चर' का अर्थ है 'धीरे चलने वाला', क्योंकि शनि ग्रह एक राशि पार करने में लगभग ढाई वर्ष लेता है।
परंपरा शनिदेव को धैर्य और ईमानदारी सिखाने वाला मानती है। वे बिना कमाए कुछ नहीं देते, बस हर व्यक्ति को उसके अपने कर्मों का फल लौटाते हैं, चाहे वह मीठा हो या कठिन। कई कथाओं में राजा उनके प्रभाव में कठिन समय से गुज़रकर और समझदार बनकर निकलते हैं। पद्मपुराण में कथा है कि श्रीराम के पिता राजा दशरथ शनि को रोहिणी नक्षत्र भेदने से रोकने निकले, क्योंकि ज्योतिषियों ने कहा था कि इससे बारह वर्ष का अकाल पड़ेगा। राजा के साहस और उनकी स्तुति से शनिदेव प्रसन्न हुए और वचन दिया कि वे उनकी प्रजा को पीड़ा नहीं देंगे।
एक प्रिय कथा यह भी है कि हनुमान जी ने शनिदेव को लंका में रावण की कैद से छुड़ाया, और शनिदेव ने वचन दिया कि हनुमान जी का स्मरण करने वालों पर वे कृपा रखेंगे। इसीलिए बहुत से लोग शनिवार को हनुमान मंदिर जाते हैं और शनि की स्तुति के साथ हनुमान चालीसा भी पढ़ते हैं।
शनिवार को भक्त तिल के तेल का दीपक जलाते हैं, काले तिल, उड़द और नीले फूल चढ़ाते हैं, और अक्सर पीपल की जड़ में जल देते हैं। उत्तर भारतीय पंचांग में शनि जयंती ज्येष्ठ अमावस्या को आती है (दक्षिण में वैशाख अमावस्या)। महाराष्ट्र का शनि शिंगणापुर और कराईकल के पास तिरुनल्लार उनके प्रसिद्ध स्थान हैं।