दशरथकृत शनि स्तोत्र

Dashrath Shani Stotra

दशरथकृत शनि स्तोत्र शनिदेव की संस्कृत स्तुति है, जिसे पद्मपुराण के अनुसार श्रीराम के पिता राजा दशरथ ने गाया था। "नमः कृष्णाय नीलाय" से शुरू होने वाले दस श्लोकों में वे शनिदेव को उनके अनेक नामों और रूपों से नमस्कार करते हैं, और प्रसन्न होकर शनिदेव वचन देते हैं कि इसका पाठ करने वालों को पीड़ा नहीं देंगे। भक्त इसे शनिवार को और साढ़ेसाती में पढ़ते हैं।

  • 10 पद
  • 3 मिनट
  • राजा दशरथ, पद्मपुराण (उत्तरखंड ३३) में
  • उत्तम दिन: शनिवार

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नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।Namah Krishnaya Nilaya Shitikantha Nibhaya Cha

नमः कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नमः॥Namah Kalagni Rupaya Kritantaya Cha Vai Namah

श्याम और नील वर्ण वाले, शिव के नीले कंठ जैसी आभा वाले शनिदेव को नमस्कार। कालाग्नि के समान रूप वाले और सबका अंत करने वाले को नमस्कार।

नमो निर्मांसदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।Namo Nirmamsa Dehaya Dirgha Shmashru Jataya Cha

नमो विशालनेत्राय शुष्कोदरभयाकृते॥Namo Vishala Netraya Shushkodara Bhayakrite

मांसरहित दुबले शरीर, लंबी दाढ़ी और जटाओं वाले को नमस्कार। बड़े नेत्रों वाले, सूखे पेट और भयानक आकृति वाले को नमस्कार।

नमः पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नमः।Namah Pushkala Gatraya Sthula Romnetha Vai Namah

नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते॥Namo Dirghaya Shushkaya Kaladamshtra Namostu Te

विशाल शरीर और घने रोमों वाले को नमस्कार। लंबे और दुबले शरीर वाले को नमस्कार। हे काल जैसी दाढ़ों वाले, आपको नमस्कार हो।

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः।Namaste Kotarakshaya Durnirikshyaya Vai Namah

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥Namo Ghoraya Raudraya Bhishanaya Kapaline

गहरी आँखों वाले, जिन्हें देख पाना कठिन है, आपको नमस्कार। घोर, रौद्र, भीषण और कपालधारी को नमस्कार।

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुख नमोऽस्तु ते।Namaste Sarvabhakshaya Valimukha Namostu Te

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च॥Suryaputra Namastestu Bhaskare Abhayadaya Cha

सबको ग्रसने वाले, आपको नमस्कार; हे झुर्रियों वाले मुख वाले, आपको नमस्कार हो। हे सूर्यपुत्र, अभय देने वाले भास्कर-नंदन, आपको नमस्कार हो।

अधोदृष्टे नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।Adhodrishte Namastestu Samvartaka Namostu Te

नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तु ते॥Namo Mandagate Tubhyam Nistrimshaya Namostu Te

हे नीची दृष्टि वाले, आपको नमस्कार हो; हे प्रलयकारी संवर्तक, आपको नमस्कार हो। हे मंद गति वाले, आपको नमस्कार; खड्गधारी, आपको नमस्कार हो।

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च।Tapasa Dagdha Dehaya Nityam Yogarataya Cha

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः॥Namo Nityam Kshudhartaya Atriptaya Cha Vai Namah

तप से जले शरीर वाले और सदा योग में लीन रहने वाले को नमस्कार। सदा भूख से पीड़ित और कभी तृप्त न होने वाले को नमस्कार।

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मजसूनवे।Jnanachakshur Namastestu Kashyapatmaja Sunave

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्॥Tushto Dadasi Vai Rajyam Rushto Harasi Tatkshanat

हे ज्ञान रूपी नेत्र वाले, कश्यप के पुत्र सूर्य के पुत्र, आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न हों तो राज्य दे देते हैं और रुष्ट हों तो उसी क्षण छीन लेते हैं।

देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगाः।Devasura Manushyashcha Siddha Vidyadharoragah

त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः॥Tvaya Vilokitah Sarve Nasham Yanti Samulatah

देवता, असुर, मनुष्य, सिद्ध, विद्याधर और नाग, जिन पर भी आपकी दृष्टि पड़ती है, वे सब जड़ से नष्ट हो जाते हैं।

प्रसादं कुरु मे देव वरार्होऽहमुपागतः।Prasadam Kuru Me Deva Vararhoham Upagatah

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबलः॥Evam Stutastada Saurir Graharajo Mahabalah

हे देव, मुझ पर कृपा कीजिए; मैं वर पाने योग्य होकर आपके पास आया हूँ। इस प्रकार स्तुति किए जाने पर तब महाबली ग्रहराज सूर्यपुत्र शनि (राजा से बोले)।

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प्रश्न

इस स्तोत्र के पीछे क्या कथा है?

यह कथा पद्मपुराण में है। ज्योतिषियों ने अयोध्या के राजा दशरथ को बताया कि शनि रोहिणी नक्षत्र को भेदने वाले हैं, जिससे बारह वर्ष का अकाल पड़ेगा। दशरथ जी रथ पर नक्षत्रलोक तक जा पहुँचे। उनके साहस से प्रसन्न होकर शनिदेव ने वर देने को कहा, और राजा ने इन श्लोकों से उनकी स्तुति की। तब शनिदेव ने वचन दिया कि वे उनकी प्रजा को पीड़ा नहीं देंगे, और जो इस स्तोत्र का पाठ करेगा उसे भी नहीं।

यह किस पुराण से है?

पद्मपुराण के उत्तरखंड, अध्याय ३३ से, जहाँ शिव जी नारद जी को यह कथा सुनाते हैं। "कोणोऽन्तको रौद्रयमोऽथ बभ्रुः" से शुरू होने वाला एक और दशरथकृत शनि स्तोत्र ब्रह्माण्डपुराण का है; वह अलग स्तोत्र है।

क्या शनिवार शाम को पाठ कर सकते हैं?

हाँ। पुराण में शनिवार सुबह का उल्लेख है, और बहुत लोग शाम को तिल के तेल का दीपक जलाकर पढ़ते हैं। दोनों समय ठीक हैं।

साढ़ेसाती क्या है?

ज्योतिष में यह लगभग साढ़े सात वर्ष का समय है, जब शनि आपकी चंद्र राशि से पहले वाली राशि, आपकी चंद्र राशि और उसके बाद वाली राशि से गुज़रता है। ज़्यादातर लोगों के जीवन में यह दो-तीन बार आती है। परंपरा इसे धैर्य, लगन से मेहनत और प्रार्थना का समय मानती है, और उस समय परिवार जिन स्तुतियों का सहारा लेते हैं, उनमें यह स्तोत्र भी है। इसका पाठ करने के लिए कुछ खरीदने या पैसे देकर अनुष्ठान कराने की ज़रूरत नहीं।

पाठ में कितना समय लगता है?

धीरे-धीरे पढ़ें तो लगभग तीन मिनट।

स्रोत और समीक्षा

स्रोत: Padma Purana, Uttara Khanda, adhyaya 33, verses 28 to 37 (Sanskrit Wikisource: पद्मपुराणम्/खण्डः ६ (उत्तरखण्डः)/अध्यायः ०३३), cross-checked line by line with BhaktiBharat.com (mantra/dashratha-shani-sotra) and onlinejyotish.com (shani-stotra)

The Wikisource text omits avagrahas and uses anusvara (कृतांताय, मंदगते); we restore avagrahas and print the class nasals, as BhaktiBharat does. Readings: "भास्करेऽभयदाय" (v5) follows BhaktiBharat, since the Wikisource "भास्करे भयदाय" can be read either way; "वलीमुख" (v5) follows the Purana (BhaktiBharat "बलीमुख"); "दुर्निरीक्ष्याय" (v4) follows the Purana (BhaktiBharat "दुर्नरीक्ष्याय"); "कपालिने" (v4) is in both, though many recite "करालिने"; the first line of v10 follows the Purana ("प्रसादं कुरु मे देव वरार्होऽहमुपागतः"), where BhaktiBharat has "प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे". A longer Shanaishchara stotra on sanskritdocuments.org (shanaishcharastotram) and the version on stotranidhi/shlokam.org use a different recension ("शिखिकण्ठनिभाय", "नीलमधूकाय" etc.); we did not mix readings from it.

मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।

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त्रुटि बताएँ अंतिम अद्यतन 2026-10-04

मुख्य तथ्य

रचयिता
राजा दशरथ, पद्मपुराण (उत्तरखंड ३३) में
श्लोक / पद
10
मूल भाषा
संस्कृत
स्रोत संस्करण
Padma Purana, Uttara Khanda, adhyaya 33, verses 28 to 37 (Sanskrit Wikisource: पद्मपुराणम्/खण्डः ६ (उत्तरखण्डः)/अध्यायः ०३३), cross-checked line by line with BhaktiBharat.com (mantra/dashratha-shani-sotra) and onlinejyotish.com (shani-stotra)
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इस पन्ने का संदर्भ दें

“दशरथकृत शनि स्तोत्र”. Nitya, अद्यतन 2026-10-04. https://getnitya.com/hi/shani/dashrath-shani-stotra/

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