श्री हनुमान चालीसा
Hanuman Chalisa
हनुमान चालीसा भगवान हनुमान की स्तुति है, जिसे १६वीं शताब्दी के संत-कवि गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी में लिखा। इसके ४३ पदों (आरंभ के दो दोहे, ४० चौपाइयाँ और अंत का एक दोहा) में हनुमान जी का गुणगान है और श्रीराम के लिए किए उनके कामों की कथा है। बहुत से भक्त इसका पाठ रोज़ करते हैं, ख़ासकर मंगलवार और शनिवार को।
- 43 पद
- 8 मिनट
- गोस्वामी तुलसीदास
- उत्तम दिन: मंगलवार, शनिवार
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।Shri Guru Charan Saroj Raj, Nij Manu Mukuru Sudhari
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥Baranau Raghubar Bimal Jasu, Jo Dayaku Phal Chari
श्री गुरुदेव के चरणकमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को निर्मल करके मैं रघुकुल श्रेष्ठ श्रीराम के उस पवित्र यश का वर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों फल देने वाला है।
- श्रीगुरुश्री गुरुदेव
- चरनचरण
- सरोजकमल
- रजधूल
- निजअपना
- मनुमन
- मुकुरुदर्पण
- सुधारिस्वच्छ करके
- बरनउँवर्णन करता हूँ
- रघुबररघुकुल श्रेष्ठ श्रीराम
- बिमलनिर्मल
- जसुयश
- जोजो
- दायकुदेने वाला
- फलफल
- चारिचार
चार फल: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। यही दोहा तुलसीदास जी के श्रीरामचरितमानस के अयोध्याकांड का भी प्रथम दोहा है।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।Buddhiheen Tanu Janike, Sumirau Pavan Kumar
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥Bal Buddhi Bidya Dehu Mohi, Harahu Kalesh Bikar
स्वयं को बुद्धिहीन जानकर मैं पवनपुत्र हनुमान जी का स्मरण करता हूँ। हे प्रभु, मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए और मेरे सब क्लेश तथा विकार दूर कीजिए।
- बुद्धिहीनबुद्धि से रहित
- तनुशरीर, स्वयं को
- जानिकेजानकर
- सुमिरौंस्मरण करता हूँ
- पवन-कुमारपवनपुत्र हनुमान
- बलबल
- बुधिबुद्धि
- बिद्याविद्या
- देहुदीजिए
- मोहिंमुझे
- हरहुहर लीजिए
- कलेसक्लेश, दुःख
- बिकारविकार, दोष
क्लेश और विकार से परंपरागत रूप से काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि मन के दोष समझे जाते हैं।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।Jai Hanuman Gyan Gun Sagar
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥Jai Kapis Tihun Lok Ujagar
हे हनुमान जी, आपकी जय हो! आप ज्ञान और गुणों के सागर हैं। हे कपीश्वर, आपकी जय हो! आपकी कीर्ति तीनों लोकों में प्रकाशित है।
- जयजय हो
- हनुमानहनुमान जी
- ज्ञानज्ञान
- गुनगुण
- सागरसमुद्र
- कपीसवानरों के स्वामी
- तिहुँतीनों
- लोकलोक
- उजागरप्रकाशित करने वाले
राम दूत अतुलित बल धामा।Ram Doot Atulit Bal Dhama
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥Anjani Putra Pavan Sut Nama
आप श्रीराम के दूत और अतुलनीय बल के भंडार हैं। आप अंजनीपुत्र और पवनसुत के नाम से प्रसिद्ध हैं।
- रामश्रीराम के
- दूतदूत
- अतुलितअतुलनीय
- बलबल
- धामाभंडार, निवास
- अंजनि-पुत्रअंजना के पुत्र
- पवनसुतपवन देव के पुत्र
- नामानाम से प्रसिद्ध
हनुमान जी की माता अंजना और पिता वानरराज केसरी हैं; पवन देव उनके दिव्य पिता माने जाते हैं।
महाबीर बिक्रम बजरंगी।Mahabir Bikram Bajrangi
कुमति निवार सुमति के संगी॥Kumati Nivar Sumati Ke Sangi
आप महान वीर, पराक्रमी और वज्र के समान अंगों वाले (बजरंगी) हैं। आप दुर्बुद्धि को दूर करते हैं और सद्बुद्धि के साथी हैं।
- महाबीरमहान वीर
- बिक्रमपराक्रमी
- बजरंगीवज्र के समान अंगों वाले
- कुमतिदुर्बुद्धि
- निवारदूर करने वाले
- सुमतिसद्बुद्धि
- केके
- संगीसाथी
'बजरंगी' शब्द 'वज्र-अंग' से बना है, यानी जिसके अंग वज्र के समान हों। इसी से 'बजरंगबली' नाम बना।
कंचन बरन बिराज सुबेसा।Kanchan Baran Biraj Subesa
कानन कुंडल कुंचित केसा॥Kanan Kundal Kunchit Kesa
आपका वर्ण स्वर्ण के समान है और आप सुंदर वेश में सुशोभित हैं। आपके कानों में कुंडल हैं और केश घुँघराले हैं।
- कंचनसोना
- बरनवर्ण, रंग
- बिराजसुशोभित
- सुबेसासुंदर वेश वाले
- काननकानों में
- कुंडलकुंडल
- कुंचितघुँघराले
- केसाकेश, बाल
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।Hath Bajra Au Dhvaja Birajai
काँधे मूँज जनेऊ साजै॥Kandhe Moonj Janeu Sajai
आपके हाथों में वज्र और ध्वजा सुशोभित हैं और कंधे पर मूँज का जनेऊ शोभा देता है।
- हाथहाथों में
- बज्रवज्र (गदा)
- औऔर
- ध्वजाध्वजा
- बिराजैसुशोभित हैं
- काँधेकंधे पर
- मूँजमूँज घास
- जनेऊयज्ञोपवीत
- साजैशोभा देता है
अनेक टीकाकार यहाँ 'बज्र' को हनुमान जी की गदा मानते हैं, जो वज्र के समान प्रहार करती है।
संकर सुवन केसरीनंदन।Sankar Suvan Kesari Nandan
तेज प्रताप महा जग बंदन॥Tej Pratap Maha Jag Bandan
आप भगवान शंकर के अंश और केसरी के नंदन हैं। आपका तेज और प्रताप महान है; सारा संसार आपकी वंदना करता है।
- संकरभगवान शंकर
- सुवनपुत्र, अंश
- केसरीनंदनकेसरी के पुत्र
- तेजतेज
- प्रतापप्रताप
- महामहान
- जगसंसार
- बंदनवंदनीय
परंपरा में हनुमान जी को भगवान शिव का अंशावतार माना जाता है। कुछ संस्करणों में 'शंकर स्वयं केसरीनंदन' पाठ मिलता है; हमने गीता प्रेस का पाठ 'संकर सुवन' रखा है।
विद्यावान गुनी अति चातुर।Vidyavan Guni Ati Chatur
राम काज करिबे को आतुर॥Ram Kaj Karibe Ko Atur
आप विद्वान, गुणवान और अत्यंत चतुर हैं तथा श्रीराम के कार्य करने के लिए सदा आतुर रहते हैं।
- विद्यावानविद्वान
- गुनीगुणवान
- अतिअत्यंत
- चातुरचतुर
- रामश्रीराम के
- काजकार्य
- करिबेकरने
- कोके लिए
- आतुरउत्सुक
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।Prabhu Charitra Sunibe Ko Rasiya
राम लखन सीता मन बसिया॥Ram Lakhan Sita Man Basiya
आप प्रभु श्रीराम की कथा सुनने के रसिक हैं। श्रीराम, लक्ष्मण और सीता जी आपके हृदय में बसते हैं।
- प्रभुप्रभु के
- चरित्रचरित्र, कथा
- सुनिबेसुनने
- कोके
- रसियारसिक, प्रेमी
- रामश्रीराम
- लखनलक्ष्मण
- सीतासीता जी
- मनमन में
- बसियाबसे हुए
मान्यता है कि जहाँ भी रामकथा होती है, वहाँ हनुमान जी हाथ जोड़कर उसे सुनने के लिए उपस्थित रहते हैं।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।Sukshma Roop Dhari Siyahi Dikhava
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥Bikat Roop Dhari Lank Jarava
आपने सूक्ष्म रूप धारण करके सीता जी को दर्शन दिए और विकराल रूप धारण करके लंका को जला दिया।
- सूक्ष्मअत्यंत छोटा
- रूपरूप
- धरिधारण करके
- सियहिंसीता जी को
- दिखावादर्शन दिए
- बिकटविकराल
- लंकलंका
- जरावाजलाया
सुंदरकांड का प्रसंग: हनुमान जी अशोक वाटिका में सीता जी से मिलते हैं, और रावण के सैनिकों द्वारा पूँछ में आग लगाए जाने पर लंका जला देते हैं।
भीम रूप धरि असुर सँहारे।Bhim Roop Dhari Asur Sanhare
रामचंद्र के काज सँवारे॥Ramchandra Ke Kaj Sanvare
आपने भयंकर रूप धारण करके असुरों का संहार किया और श्री रामचंद्र जी के कार्यों को सफल बनाया।
- भीमभयंकर
- रूपरूप
- धरिधारण करके
- असुरराक्षस
- सँहारेसंहार किया
- रामचंद्रश्री रामचंद्र
- केके
- काजकार्य
- सँवारेसफल किए
लाय सजीवन लखन जियाये।Laye Sajivan Lakhan Jiyaye
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥Shri Raghubir Harashi Ur Laye
आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी को जीवित किया, जिससे श्री रघुवीर ने प्रसन्न होकर आपको हृदय से लगा लिया।
- लायलाकर
- सजीवनसंजीवनी बूटी
- लखनलक्ष्मण जी को
- जियायेजीवित किया
- श्रीरघुबीरश्रीराम
- हरषिप्रसन्न होकर
- उरहृदय से
- लायेलगा लिया
लंकाकांड का प्रसंग: मेघनाद की शक्ति से लक्ष्मण जी के मूर्छित होने पर हनुमान जी हिमालय से संजीवनी बूटी वाला पूरा पर्वत ही उठा लाए।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।Raghupati Kinhi Bahut Badai
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥Tum Mam Priya Bharatahi Sam Bhai
रघुपति श्रीराम ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा, 'तुम मुझे भरत के समान प्रिय भाई हो।'
- रघुपतिश्रीराम
- कीन्हीकी
- बहुतबहुत
- बड़ाईप्रशंसा
- तुमतुम
- मममेरे
- प्रियप्रिय
- भरतहिभरत के
- समसमान
- भाईभाई
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।Sahas Badan Tumharo Jas Gavain
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥As Kahi Shripati Kanth Lagavain
'हज़ार मुखों वाले शेषनाग भी तुम्हारा यश गाते हैं', ऐसा कहकर लक्ष्मीपति श्रीराम ने आपको गले से लगा लिया।
- सहसहज़ार
- बदनमुख (शेषनाग)
- तुम्हरोतुम्हारा
- जसयश
- गावैंगाते हैं
- असऐसा
- कहिकहकर
- श्रीपतिलक्ष्मीपति श्रीराम
- कंठगले
- लगावैंलगाया
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।Sanakadik Brahmadi Munisa
नारद सारद सहित अहीसा॥Narad Sarad Sahit Ahisa
सनक आदि ऋषि, ब्रह्मा आदि देवता, बड़े-बड़े मुनि, नारद, सरस्वती और शेषनाग भी…
- सनकादिकसनक आदि ऋषि
- ब्रह्मादिब्रह्मा आदि देवता
- मुनीसाश्रेष्ठ मुनि
- नारदनारद मुनि
- सारदसरस्वती
- सहितसहित
- अहीसाशेषनाग
चौपाई १४ और १५ मिलकर एक वाक्य बनाती हैं: ये सब महान सत्ताएँ भी हनुमान जी का यश पूरा नहीं कह सकतीं।
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।Jam Kuber Digpal Jahan Te
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥Kabi Kobid Kahi Sake Kahan Te
यमराज, कुबेर और दिशाओं के रक्षक दिक्पाल भी जब आपका यश पूरा नहीं कह पाते, तो कवि और विद्वान उसे कैसे कह सकते हैं?
- जमयमराज
- कुबेरकुबेर
- दिगपालदिक्पाल
- जहाँ तेजहाँ वे भी
- कबिकवि
- कोबिदविद्वान
- कहि सकेकह सकें
- कहाँ तेकैसे
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।Tum Upkar Sugrivahi Kinha
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥Ram Milaye Raj Pad Dinha
आपने सुग्रीव पर बड़ा उपकार किया। उन्हें श्रीराम से मिलाकर राजपद दिलाया।
- तुमआपने
- उपकारउपकार
- सुग्रीवहिंसुग्रीव पर
- कीन्हाकिया
- रामश्रीराम से
- मिलायमिलाकर
- राज पदराजपद
- दीन्हादिलाया
किष्किंधाकांड का प्रसंग: हनुमान जी ब्राह्मण वेश में श्रीराम-लक्ष्मण से मिले और उन्हें सुग्रीव के पास ले जाकर मित्रता कराई।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।Tumharo Mantra Bibhishan Mana
लंकेस्वर भए सब जग जाना॥Lankeshwar Bhaye Sab Jag Jana
विभीषण ने आपकी सलाह मानी और वे लंका के राजा बने, यह सारा संसार जानता है।
- तुम्हरोआपका
- मंत्रपरामर्श
- बिभीषनविभीषण ने
- मानामाना
- लंकेस्वरलंका के राजा
- भएबने
- सबसारा
- जगसंसार
- जानाजानता है
जुग सहस्र जोजन पर भानू।Jug Sahasra Jojan Par Bhanu
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥Leelyo Tahi Madhur Phal Janu
हज़ारों योजन दूर स्थित सूर्य को आपने मीठा फल समझकर निगल लिया।
- जुगयुग
- सहस्रहज़ार
- जोजनयोजन
- परदूर
- भानूसूर्य
- लील्योनिगल लिया
- ताहिउसे
- मधुरमीठा
- फलफल
- जानूसमझकर
बाल्यकाल का प्रसंग: शिशु हनुमान उगते सूर्य को पका फल समझकर उसकी ओर उछल पड़े। कुछ लोग 'जुग सहस्र जोजन' को सूर्य की दूरी की पारंपरिक गणना मानते हैं; सीधा अर्थ है: हज़ारों योजन दूर।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।Prabhu Mudrika Meli Mukh Mahi
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥Jaladhi Langhi Gaye Acharaj Nahi
प्रभु श्रीराम की अँगूठी मुख में रखकर आपने समुद्र लाँघ लिया। इसमें कोई आश्चर्य नहीं।
- प्रभुप्रभु की
- मुद्रिकाअँगूठी
- मेलिरखकर
- मुखमुख
- माहींमें
- जलधिसमुद्र
- लाँघि गयेलाँघ गए
- अचरजआश्चर्य
- नाहींनहीं
श्रीराम ने सीता जी को पहचान देने के लिए हनुमान जी को अपनी अँगूठी दी थी। परंपरा कहती है कि राम-नाम साथ हो तो कोई भी सागर पार हो सकता है।
दुर्गम काज जगत के जेते।Durgam Kaj Jagat Ke Jete
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥Sugam Anugrah Tumhare Tete
संसार के जितने भी कठिन कार्य हैं, वे सब आपकी कृपा से सरल हो जाते हैं।
- दुर्गमकठिन
- काजकार्य
- जगतसंसार
- केके
- जेतेजितने
- सुगमसरल
- अनुग्रहकृपा
- तुम्हरेआपकी
- तेतेउतने ही
राम दुआरे तुम रखवारे।Ram Duare Tum Rakhvare
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥Hot Na Agya Binu Paisare
आप श्रीराम के द्वार के रखवाले हैं; आपकी आज्ञा के बिना वहाँ कोई प्रवेश नहीं कर सकता।
- रामश्रीराम के
- दुआरेद्वार पर
- तुमआप
- रखवारेरक्षक
- होत ननहीं होता
- आज्ञाआज्ञा
- बिनुबिना
- पैसारेप्रवेश
परंपरा में इसका भाव है कि हनुमान जी की भक्ति से ही श्रीराम की कृपा का द्वार खुलता है।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।Sab Sukh Lahai Tumhari Sarna
तुम रच्छक काहू को डर ना॥Tum Rakshak Kahu Ko Dar Na
आपकी शरण में आने वाला सब सुख पाता है। जब आप रक्षक हैं, तो किसी का डर नहीं रहता।
- सबसब
- सुखसुख
- लहैपाता है
- तुम्हारीआपकी
- सरनाशरण
- तुमआप
- रच्छकरक्षक
- काहूकिसी
- कोका
- डर नाडर नहीं
आपन तेज सम्हारो आपै।Aapan Tej Samharo Aapai
तीनों लोक हाँक तें काँपै॥Teenon Lok Hank Te Kanpai
अपने तेज को आप ही सँभाल सकते हैं; आपकी एक हुंकार से तीनों लोक काँप उठते हैं।
- आपनअपना
- तेजतेज
- सम्हारोसँभालते हो
- आपैआप ही
- तीनोंतीनों
- लोकलोक
- हाँकहुंकार
- तेंसे
- काँपैकाँपते हैं
कुछ संस्करणों में 'संहारो' पाठ है; हमने गीता प्रेस का पाठ 'सम्हारो' (सँभालना) रखा है।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।Bhoot Pisach Nikat Nahi Aavai
महाबीर जब नाम सुनावै॥Mahabir Jab Naam Sunavai
जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम लिया जाता है, वहाँ भूत-पिशाच पास नहीं आते।
- भूतभूत
- पिसाचपिशाच
- निकटपास
- नहिंनहीं
- आवैआते
- महाबीरमहावीर
- जबजब
- नामनाम
- सुनावैसुनाया जाता है
परंपरा में इसे बाहरी और भीतरी दोनों अर्थों में लिया जाता है: हनुमान जी का नाम भय, आशंका और मन के 'भूतों' को भी दूर करता है।
नासै रोग हरै सब पीरा।Nasai Rog Harai Sab Peera
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥Japat Nirantar Hanumat Beera
वीर हनुमान जी का निरंतर जप करने से रोग नष्ट होते हैं और सारी पीड़ा दूर हो जाती है।
- नासैनष्ट करते हैं
- रोगरोग
- हरैहर लेते हैं
- सबसारी
- पीरापीड़ा
- जपतजप करने से
- निरंतरलगातार
- हनुमतहनुमान
- बीरावीर
यह भक्ति और आस्था का वचन है, जो अनेक लोगों को संबल देता है; यह चिकित्सा का विकल्प नहीं है।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।Sankat Ten Hanuman Chhudavai
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥Man Kram Bachan Dhyan Jo Lavai
जो मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, उसे हनुमान जी सब संकटों से छुड़ा देते हैं।
- संकटसंकट
- तेंसे
- हनुमानहनुमान जी
- छुड़ावैछुड़ाते हैं
- मनमन
- क्रमकर्म
- बचनवचन
- ध्यानध्यान
- जोजो
- लावैलगाता है
अनेक प्रचलित संस्करणों में 'संकट से' पाठ है; गीता प्रेस में अवधी रूप 'संकट तें' है। अर्थ एक ही है।
सब पर राम तपस्वी राजा।Sab Par Ram Tapasvi Raja
तिन के काज सकल तुम साजा॥Tin Ke Kaj Sakal Tum Saja
तपस्वी राजा श्रीराम सबसे श्रेष्ठ हैं, और उनके सब कार्य आपने ही सँवारे।
- सबसब
- परके ऊपर
- रामश्रीराम
- तपस्वीतपस्वी
- राजाराजा
- तिन केउनके
- काजकार्य
- सकलसब
- तुमआपने
- साजासँवारे
और मनोरथ जो कोइ लावै।Aur Manorath Jo Koi Lavai
सोइ अमित जीवन फल पावै॥Soi Amit Jivan Phal Pavai
जो कोई भी अपनी कोई मनोकामना लेकर आपके पास आता है, वह जीवन का असीम फल प्राप्त करता है।
- औरकोई भी अन्य
- मनोरथमनोकामना
- जोजो
- कोइकोई
- लावैलेकर आता है
- सोइवही
- अमितअसीम
- जीवनजीवन
- फलफल
- पावैपाता है
गीता प्रेस में 'कोइ … सोइ' पाठ है; प्रचलित संस्करणों में 'कोई … सोई' और कहीं 'तासु' मिलता है। अर्थ वही है।
चारों जुग परताप तुम्हारा।Charon Jug Partap Tumhara
है परसिद्ध जगत उजियारा॥Hai Parsiddh Jagat Ujiyara
चारों युगों में आपका प्रताप है; आपकी कीर्ति सारे संसार में प्रसिद्ध है और जगत को उजियारा देती है।
- चारोंचारों
- जुगयुग
- परतापप्रताप
- तुम्हाराआपका
- हैहै
- परसिद्धप्रसिद्ध
- जगतसंसार
- उजियाराउजाला
चार युग: सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि। हनुमान जी की गणना चिरंजीवियों में होती है।
साधु संत के तुम रखवारे।Sadhu Sant Ke Tum Rakhvare
असुर निकंदन राम दुलारे॥Asur Nikandan Ram Dulare
आप साधु-संतों के रक्षक, असुरों का नाश करने वाले और श्रीराम के दुलारे हैं।
- साधुसाधु
- संतसंत
- केके
- तुमआप
- रखवारेरक्षक
- असुरराक्षस
- निकंदननाश करने वाले
- रामश्रीराम के
- दुलारेप्यारे
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।Ashta Siddhi Nau Nidhi Ke Data
अस बर दीन जानकी माता॥As Bar Din Janaki Mata
माता जानकी ने आपको ऐसा वर दिया है कि आप आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ देने वाले हैं।
- अष्टआठ
- सिद्धिसिद्धियाँ
- नौनौ
- निधिनिधियाँ
- केके
- दातादेने वाले
- असऐसा
- बरवरदान
- दीनदिया
- जानकीजानकी
- मातामाता
आठ सिद्धियाँ: अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व; नौ निधियाँ कुबेर के नौ खज़ाने मानी जाती हैं।
राम रसायन तुम्हरे पासा।Ram Rasayan Tumhare Pasa
सदा रहो रघुपति के दासा॥Sada Raho Raghupati Ke Dasa
आपके पास राम-भक्ति रूपी रसायन है; आप सदा रघुपति श्रीराम के दास बने रहते हैं।
- रामराम
- रसायनरसायन, अमृत औषधि
- तुम्हरेआपके
- पासापास
- सदासदा
- रहोरहते हो
- रघुपतिश्रीराम
- केके
- दासासेवक
तुम्हरे भजन राम को पावै।Tumhare Bhajan Ram Ko Pavai
जनम जनम के दुख बिसरावै॥Janam Janam Ke Dukh Bisravai
आपके भजन से मनुष्य श्रीराम को पाता है और जन्म-जन्मांतर के दुखों को भूल जाता है।
- तुम्हरेआपके
- भजनभजन से
- रामश्रीराम
- कोको
- पावैपाता है
- जनम जनमजन्म-जन्मांतर
- केके
- दुखदुख
- बिसरावैभुला देता है
अंत काल रघुबर पुर जाई।Ant Kal Raghubar Pur Jai
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥Jahan Janma Haribhakt Kahai
अंत समय में वह श्री रघुनाथ जी के धाम जाता है, और जहाँ भी जन्म लेता है, हरिभक्त कहलाता है।
- अंतअंत
- कालसमय
- रघुबरश्रीराम के
- पुरधाम
- जाईजाता है
- जहाँजहाँ
- जन्मजन्म
- हरिभक्तहरि का भक्त
- कहाईकहलाता है
और देवता चित्त न धरई।Aur Devta Chitt Na Dharai
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥Hanumat Sei Sarb Sukh Karai
किसी अन्य देवता को मन में धारण न करके भी, केवल हनुमान जी की सेवा से सब सुख प्राप्त होते हैं।
- औरअन्य
- देवतादेवता
- चित्तमन में
- नन
- धरईधारण करे
- हनुमतहनुमान जी की
- सेइसेवा करके
- सर्बसब
- सुखसुख
- करईप्राप्त करता है
परंपरा में इसे हनुमान जी की महिमा के रूप में पढ़ा जाता है, अन्य देवताओं की उपेक्षा के रूप में नहीं। हनुमान जी स्वयं भक्त को श्रीराम तक पहुँचाते हैं।
संकट कटै मिटै सब पीरा।Sankat Katai Mitai Sab Peera
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥Jo Sumirai Hanumat Balbeera
जो बलवीर हनुमान जी का स्मरण करता है, उसके संकट कट जाते हैं और सब पीड़ा मिट जाती है।
- संकटसंकट
- कटैकट जाते हैं
- मिटैमिट जाती है
- सबसब
- पीरापीड़ा
- जोजो
- सुमिरैस्मरण करता है
- हनुमतहनुमान
- बलबीराबलवान वीर
जै जै जै हनुमान गोसाईं।Jai Jai Jai Hanuman Gosain
कृपा करहु गुरु देव की नाईं॥Kripa Karahu Guru Dev Ki Nain
हे स्वामी हनुमान जी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप गुरुदेव की भाँति मुझ पर कृपा कीजिए।
- जैजय
- हनुमानहनुमान
- गोसाईंस्वामी
- कृपाकृपा
- करहुकीजिए
- गुरु देवगुरुदेव
- कीकी
- नाईंभाँति
जो सत बार पाठ कर कोई।Jo Sat Bar Path Kar Koi
छूटहि बंदि महा सुख होई॥Chhutahi Bandi Maha Sukh Hoi
जो कोई इसका सौ बार पाठ करता है, वह बंधनों से छूट जाता है और उसे महान सुख मिलता है।
- जोजो
- सतसौ
- बारबार
- पाठपाठ
- करकरता है
- कोईकोई
- छूटहिछूट जाता है
- बंदिबंधन
- महामहान
- सुखसुख
- होईहोता है
'सत बार' का शाब्दिक अर्थ है सौ बार; कुछ लोग 'सत' को 'सच्चे मन से' भी पढ़ते हैं। 'बंदि' से सांसारिक बंधन और कारावास, दोनों अर्थ लिए जाते हैं।
जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा।Jo Yah Padhai Hanuman Chalisa
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥Hoy Siddhi Sakhi Gaurisa
जो इस हनुमान चालीसा का पाठ करता है, उसे सिद्धि प्राप्त होती है। इसके साक्षी स्वयं गौरीपति भगवान शिव हैं।
- जोजो
- यहयह
- पढ़ैपढ़ता है
- हनुमान चलीसाहनुमान चालीसा
- होयहोती है
- सिद्धिसिद्धि
- साखीसाक्षी
- गौरीसागौरीपति शिव
गीता प्रेस में छंद की मात्रा के अनुसार यहाँ 'चलीसा' रूप छपा है; गायन में प्रायः 'चालीसा' ही बोला जाता है।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।Tulsidas Sada Hari Chera
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥Kijai Nath Hriday Mah Dera
तुलसीदास सदा श्रीहरि के सेवक हैं। हे नाथ, आप मेरे हृदय में निवास कीजिए।
- तुलसीदासतुलसीदास
- सदासदा
- हरिश्रीहरि के
- चेरासेवक
- कीजैकीजिए
- नाथहे नाथ
- हृदयहृदय
- महँमें
- डेरानिवास
यहाँ तुलसीदास जी ने अपना नाम दिया है। उस समय के कवि अंतिम पद में अपनी 'छाप' देते थे।
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।Pavan Tanay Sankat Haran, Mangal Murati Roop
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥Ram Lakhan Sita Sahit, Hriday Basahu Sur Bhoop
हे पवनपुत्र, संकटों को हरने वाले, मंगल की मूर्ति! हे देवताओं के राजा, आप श्रीराम, लक्ष्मण और सीता जी सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए।
- पवनतनयपवनपुत्र
- संकटसंकट
- हरनहरने वाले
- मंगलमंगल
- मूरतिमूर्ति
- रूपस्वरूप
- रामश्रीराम
- लखनलक्ष्मण
- सीतासीता जी
- सहितसहित
- हृदयहृदय में
- बसहुनिवास कीजिए
- सुरदेवताओं के
- भूपराजा
पूर्ण
श्री हनुमान चालीसा का पाठ पूर्ण हुआ।
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प्रश्न
हनुमान चालीसा किसने और कब लिखी?
गोस्वामी तुलसीदास ने, जो १६वीं शताब्दी के संत-कवि थे और जिन्होंने श्रीरामचरितमानस भी लिखा। यह अवधी में है, और चालीसवीं चौपाई में तुलसीदास जी ने अपना नाम दिया है। एक प्रचलित कथा के अनुसार उन्होंने इसे मुग़ल दरबार में बंदी रहते हुए रचा, पर इसकी ऐतिहासिक पुष्टि नहीं होती।
हनुमान चालीसा कितनी बार पढ़नी चाहिए?
रोज़ एक बार, मन लगाकर, यही आम परंपरा है। बहुत से भक्त, ख़ासकर मंगलवार और शनिवार को, ३, ७ या ११ बार पाठ करते हैं, और किसी विशेष संकल्प के लिए १०८ पाठ भी करते हैं। चालीसा में ख़ुद (चौपाई ३८) सौ बार पाठ की बात है। उतनी संख्या चुनें जो आप नियम से निभा सकें; परंपरा में संख्या से ज़्यादा श्रद्धा का महत्व है।
हनुमान चालीसा पढ़ने का सबसे अच्छा दिन और समय कौन सा है?
मंगलवार और शनिवार हनुमान जी के परंपरागत दिन हैं, और हनुमान जयंती ख़ास है। सुबह नहाने के बाद और शाम को दीया जलाते समय पाठ करना अच्छा माना जाता है। पर कोई कड़ा नियम नहीं है। विदेश में बसे कई परिवार स्कूल से पहले, रास्ते में या सोने से पहले पाठ करते हैं।
क्या महिलाएँ हनुमान चालीसा पढ़ सकती हैं?
हाँ। घरों और मंदिरों में महिलाएँ रोज़ इसका पाठ करती हैं, और इसके अंतिम पदों में 'जो यह पढ़ै' कहकर हर पढ़ने वाले को फल बताया गया है। कुछ परिवार अपनी रीतियाँ मानते हैं, जैसे मासिक धर्म के दिनों में, तो अपने घर की परंपरा के अनुसार चलें।
'भूत पिसाच निकट नहिं आवै' का क्या अर्थ है?
चौबीसवीं चौपाई कहती है कि जहाँ महावीर का नाम लिया जाता है, वहाँ भूत-पिशाच पास नहीं आते। परंपरा इसे बाहरी और भीतरी दोनों अर्थों में लेती है: हनुमान जी का नाम डर और घबराहट को भी दूर करता है। इसीलिए बहुत से लोग डर लगने पर यह पंक्ति मन में दोहराते हैं।
क्या चालीसा पढ़ने के लिए अवधी समझना ज़रूरी है?
नहीं। ज़्यादातर लोग हर शब्द का अर्थ जानने से बरसों पहले से इसका पाठ करते आ रहे होते हैं। साथ-साथ हर पद का अर्थ पढ़ने से भाव मन में और अच्छी तरह उतरता है।
हनुमान चालीसा के पाठ में कितना समय लगता है?
सधी हुई गति से लगभग ८ मिनट।
स्रोत और समीक्षा
स्रोत: Shri Hanuman Chalisa, Gita Press Gorakhpur reading (as printed in the appendix to Gita Press's Shri Ramcharitmanas; scanned copy on archive.org), cross-checked line by line with sanskritdocuments.org (doc_z_otherlang_hindi/chaalisa) and vignanam.org
We follow the Gita Press text wherever editions differ: 'Sankar suvan' (not 'Shankar swayam', ch. 6), 'samharo' (not 'sanharo', ch. 23), 'Sankat ten' (not 'Sankat se', ch. 26), 'koi … soi' (ch. 28), 'Hanuman chalisa' in its metrical form चलीसा (ch. 39) and 'hriday mahan' (हृदय महँ, not 'मँह', ch. 40). Obvious OCR slips in the scan were corrected against the other sources. The Gita Press scan shows 'लषन' in two places, an older spelling of 'लखन'; we print 'लखन' throughout.
मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।
ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।