लिङ्गाष्टकम्
Lingashtakam
लिङ्गाष्टकम् शिवलिंग की स्तुति में संस्कृत के आठ श्लोकों का स्तोत्र है। हर श्लोक "तत्प्रणमामि सदा शिव लिङ्गम्" पर ख़त्म होता है, यानी "उस शिवलिंग को मैं सदा प्रणाम करता हूँ"। अंत की फलश्रुति कहती है कि जो इसे शिव के समीप पढ़ता है, वह शिवलोक पाता है। परंपरा से इसे अभिषेक के समय, सोमवार को और महाशिवरात्रि की रात गाया जाता है।
- 9 पद
- 5 मिनट
- पारंपरिक (रचयिता अज्ञात; लोक में आदि शंकराचार्य से जोड़ा जाता है)
- उत्तम दिन: सोमवार
ब्रह्ममुरारिसुरार्चित लिङ्गंBrahma Murari Surarchita Lingam
निर्मलभासितशोभित लिङ्गम्।Nirmala Bhasita Shobhita Lingam
जन्मजदुःखविनाशक लिङ्गंJanmaja Dukha Vinashaka Lingam
तत्प्रणमामि सदा शिव लिङ्गम्॥Tat Pranamami Sada Shiva Lingam
जो लिंग ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवताओं द्वारा पूजित है, जो निर्मल, प्रकाशमान और शोभायमान है, जो जन्म-मरण के चक्र से उपजे दुःखों का नाश करता है, उस शिवलिंग को मैं सदा प्रणाम करता हूँ।
- ब्रह्ममुरारिसुरार्चितब्रह्मा, विष्णु (मुरारि) और देवताओं द्वारा पूजित
- लिङ्गंशिवलिंग
- निर्मलभासितशोभितनिर्मल, प्रकाशमान और शोभायमान
- जन्मजदुःखविनाशकजन्म से उपजे दुःख का नाश करने वाला
- तत्उस
- प्रणमामिमैं प्रणाम करता हूँ
- सदासदा
- शिवकल्याणकारी शिव का
- लिङ्गम्शिवलिंग
टेक "सदा शिव लिङ्गम्" के दो अर्थ किए जाते हैं। हमने "सदा" को "हमेशा" माना है (उस शिवलिंग को मैं सदा प्रणाम करता हूँ)। कुछ पुस्तकें इसे एक समास "सदाशिवलिङ्गम्" मानती हैं, यानी सदाशिव का लिंग। उच्चारण दोनों में एक ही है।
देवमुनिप्रवरार्चित लिङ्गंDeva Muni Pravararchita Lingam
कामदहं करुणाकर लिङ्गम्।Kamadaham Karunakara Lingam
रावणदर्पविनाशन लिङ्गंRavana Darpa Vinashana Lingam
तत्प्रणमामि सदा शिव लिङ्गम्॥Tat Pranamami Sada Shiva Lingam
जो लिंग श्रेष्ठ देवताओं और मुनियों द्वारा पूजित है, जिसने कामदेव को भस्म किया और जो करुणा का सागर है, जिसने रावण के अहंकार को चूर किया, उस शिवलिंग को मैं सदा प्रणाम करता हूँ।
- देवमुनिप्रवरार्चितश्रेष्ठ देवों और मुनियों द्वारा पूजित
- लिङ्गंशिवलिंग
- कामदहंकामदेव को भस्म करने वाला
- करुणाकरकरुणा की खान
- रावणदर्पविनाशनरावण के अहंकार का नाश करने वाला
सर्वसुगन्धसुलेपित लिङ्गंSarva Sugandha Sulepita Lingam
बुद्धिविवर्धनकारण लिङ्गम्।Buddhi Vivardhana Karana Lingam
सिद्धसुरासुरवन्दित लिङ्गंSiddha Surasura Vandita Lingam
तत्प्रणमामि सदा शिव लिङ्गम्॥Tat Pranamami Sada Shiva Lingam
जो लिंग सभी सुगंधित द्रव्यों से सुशोभित रूप में लेपित है, जो बुद्धि की वृद्धि का कारण है, जिसकी वंदना सिद्ध, देवता और असुर सभी करते हैं, उस शिवलिंग को मैं सदा प्रणाम करता हूँ।
- सर्वसुगन्धसुलेपितसभी सुगंधित द्रव्यों से भली-भाँति लेपित
- लिङ्गंशिवलिंग
- बुद्धिविवर्धनकारणबुद्धि की वृद्धि का कारण
- सिद्धसुरासुरवन्दितसिद्धों, देवताओं और असुरों द्वारा वंदित
कनकमहामणिभूषित लिङ्गंKanaka Mahamani Bhushita Lingam
फणिपतिवेष्टितशोभित लिङ्गम्।Phanipati Veshtita Shobhita Lingam
दक्षसुयज्ञविनाशन लिङ्गंDaksha Suyajna Vinashana Lingam
तत्प्रणमामि सदा शिव लिङ्गम्॥Tat Pranamami Sada Shiva Lingam
जो लिंग स्वर्ण और महामणियों से विभूषित है, जो नागराज के लिपटने से शोभायमान है, जिसने दक्ष प्रजापति के अहंकारपूर्ण यज्ञ का विध्वंस किया, उस शिवलिंग को मैं सदा प्रणाम करता हूँ।
- कनकमहामणिभूषितस्वर्ण और महामणियों से विभूषित
- लिङ्गंशिवलिंग
- फणिपतिवेष्टितशोभितनागराज से लिपटा हुआ और शोभायमान
- दक्षसुयज्ञविनाशनदक्ष प्रजापति के यज्ञ का विध्वंस करने वाला
कुङ्कुमचन्दनलेपित लिङ्गंKumkuma Chandana Lepita Lingam
पङ्कजहारसुशोभित लिङ्गम्।Pankaja Hara Sushobhita Lingam
सञ्चितपापविनाशन लिङ्गंSanchita Papa Vinashana Lingam
तत्प्रणमामि सदा शिव लिङ्गम्॥Tat Pranamami Sada Shiva Lingam
जो लिंग कुमकुम और चंदन से लेपित है, जो कमल की मालाओं से सुशोभित है, जो अनेक जन्मों के संचित पापों का नाश करता है, उस शिवलिंग को मैं सदा प्रणाम करता हूँ।
- कुङ्कुमचन्दनलेपितकुमकुम और चंदन से लेपित
- लिङ्गंशिवलिंग
- पङ्कजहारसुशोभितकमल की मालाओं से सुशोभित
- सञ्चितपापविनाशनसंचित पापों का नाश करने वाला
देवगणार्चितसेवित लिङ्गंDevaganarchita Sevita Lingam
भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम्।Bhavair Bhaktibhireva Cha Lingam
दिनकरकोटिप्रभाकर लिङ्गंDinakara Koti Prabhakara Lingam
तत्प्रणमामि सदा शिव लिङ्गम्॥Tat Pranamami Sada Shiva Lingam
जो लिंग देवगणों द्वारा पूजित और सेवित है, जो सच्चे भाव और भक्ति से ही प्राप्त होता है, जो करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान है, उस शिवलिंग को मैं सदा प्रणाम करता हूँ।
- देवगणार्चितसेवितदेवगणों द्वारा पूजित और सेवित
- लिङ्गंशिवलिंग
- भावैःसच्चे भावों से
- भक्तिभिःभक्ति से
- एवही
- चऔर
- दिनकरकोटिप्रभाकरकरोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान
अष्टदलोपरिवेष्टित लिङ्गंAshtadalopari Veshtita Lingam
सर्वसमुद्भवकारण लिङ्गम्।Sarva Samudbhava Karana Lingam
अष्टदरिद्रविनाशन लिङ्गंAshta Daridra Vinashana Lingam
तत्प्रणमामि सदा शिव लिङ्गम्॥Tat Pranamami Sada Shiva Lingam
जो लिंग अष्टदल कमल पर विराजित है, जो समस्त सृष्टि की उत्पत्ति का कारण है, जो आठ प्रकार की दरिद्रता का नाश करता है, उस शिवलिंग को मैं सदा प्रणाम करता हूँ।
- अष्टदलोपरिवेष्टितअष्टदल कमल पर विराजित
- लिङ्गंशिवलिंग
- सर्वसमुद्भवकारणसमस्त सृष्टि की उत्पत्ति का कारण
- अष्टदरिद्रविनाशनआठ प्रकार की दरिद्रता का नाश करने वाला
सुरगुरुसुरवरपूजित लिङ्गंSuraguru Suravara Pujita Lingam
सुरवनपुष्पसदार्चित लिङ्गम्।Suravana Pushpa Sadarchita Lingam
परात्परं परमात्मक लिङ्गंParatparam Paramatmaka Lingam
तत्प्रणमामि सदा शिव लिङ्गम्॥Tat Pranamami Sada Shiva Lingam
जो लिंग देवगुरु बृहस्पति और श्रेष्ठ देवताओं द्वारा पूजित है, जिसकी पूजा सदा देवलोक के नंदनवन के पुष्पों से होती है, जो परे से भी परे और स्वयं परमात्म-स्वरूप है, उस शिवलिंग को मैं सदा प्रणाम करता हूँ।
- सुरगुरुसुरवरपूजितदेवगुरु बृहस्पति और श्रेष्ठ देवताओं द्वारा पूजित
- लिङ्गंशिवलिंग
- सुरवनपुष्पसदार्चितदेवताओं के उपवन के पुष्पों से सदा पूजित
- परात्परंपरे से भी परे
- परमात्मकपरमात्मा स्वरूप
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ।Lingashtakamidam Punyam Yah Pathet Shivasannidhau
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥Shivalokam Avapnoti Shivena Saha Modate
जो कोई इस पवित्र लिङ्गाष्टक का पाठ भगवान शिव के समीप करता है, वह शिवलोक को प्राप्त करता है और वहाँ शिव के साथ आनंदित होता है।
- लिङ्गाष्टकम्लिंग की स्तुति के ये आठ श्लोक
- इदंयह
- पुण्यंपवित्र, पुण्यदायक
- यःजो
- पठेत्पढ़ता है
- शिवसन्निधौशिव के समीप
- शिवलोकम्शिवलोक को
- अवाप्नोतिप्राप्त करता है
- शिवेनशिव के
- सहसाथ
- मोदतेआनंदित होता है
The phalashruti ("fruit of hearing") is the traditional closing verse describing the merit of the hymn.
पूर्ण
लिङ्गाष्टकम् का पाठ पूर्ण हुआ।
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प्रश्न
"तत्प्रणमामि सदा शिव लिङ्गम्" का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है "उस शिवलिंग को मैं सदा प्रणाम करता हूँ"। तत् यानी उस, प्रणमामि यानी मैं प्रणाम करता हूँ, सदा यानी हमेशा, और शिव लिङ्गम् यानी शिवलिंग। कुछ पुस्तकें इसे एक शब्द "सदाशिवलिङ्गम्" लिखती हैं, यानी सदाशिव का लिंग; उच्चारण वही रहता है। यह पंक्ति आठों श्लोकों के अंत में आती है।
लिङ्गाष्टकम् की रचना किसने की?
पक्का पता नहीं है। लोकप्रिय पुस्तकें इसे अक्सर आदि शंकराचार्य की रचना बताती हैं, पर स्तोत्र में रचयिता का नाम या पुष्पिका नहीं है, इसलिए विद्वान इसे पारंपरिक स्तोत्र मानते हैं।
लिङ्गाष्टकम् का पाठ कब करना चाहिए?
शिवलिंग पर जल, दूध या बेलपत्र चढ़ाते समय। सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि की रात इसका पाठ ख़ास तौर पर होता है। फलश्रुति शिव के समीप पाठ करने को कहती है, इसलिए लोग इसे मंदिर में या घर में शिवलिंग के सामने पढ़ते हैं।
स्रोत और समीक्षा
स्रोत: Lingashtakam as printed in "Prabhata Stotranidhi" (stotranidhi.com, Devanagari); cross-checked line by line with sanskritdocuments.org lingashh.itx (encoded and proofread by Srinivas Sunder, updated 2022)
We follow stotranidhi.com, which matches how the hymn is sung (four half-lines per verse). Variants in sanskritdocuments.org: "सदाशिवलिङ्गम्" as one compound (same sound); "सर्वसुगन्धिसुलेपित" for "सर्वसुगन्धसुलेपित" (v3); "निर्मलभाषित" noted as a variant of "निर्मलभासित" (v1); "अष्टदरिद्रविनाशित" (v7); "पठेत् शिवसन्निधौ" without sandhi in the phalashruti. stotranidhi notes "परमपदं" as a variant of "परमात्मक" (v8).
मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।
ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।