ॐ जय शिव ओंकारा
Om Jai Shiv Omkara
ॐ जय शिव ओंकारा भगवान शिव की सबसे ज़्यादा गाई जाने वाली हिंदी आरतियों में से एक है। इसकी टेक और ग्यारह पदों में शिव को ओंकार स्वरूप कहा गया है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव एक हैं। अंतिम पद में स्वामी शिवानंद का नाम आता है। शिव पूजा के अंत में दीपक से यह आरती उतारी जाती है, ख़ासकर सोमवार, सावन और महाशिवरात्रि पर।
- 12 पद
- 6 मिनट
- स्वामी शिवानंद (अंतिम पद में नाम, परंपरा के अनुसार)
- उत्तम दिन: सोमवार
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।Om Jai Shiv Omkara, Swami Jai Shiv Omkara
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥Brahma Vishnu Sadashiv, Ardhangi Dhara
हे ओंकार स्वरूप शिव, आपकी जय हो! हे स्वामी, आपकी जय हो। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव हैं, और आपने अपनी अर्धांगिनी (पार्वती) को अपने आधे अंग में धारण किया है।
कुछ पुस्तकों में आरंभ "जय शिव ओंकारा, प्रभु हर शिव ओंकारा" भी मिलता है; ऊपर दिया पाठ सबसे अधिक गाया जाता है।
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।Ekanan Chaturanan Panchanan Raje
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥Hansasan Garudasan Vrishvahan Saje
आप एक मुख (विष्णु), चार मुख (ब्रह्मा) और पाँच मुख (शिव) वाले रूपों में शोभा पाते हैं; हंस, गरुड़ और वृषभ आपके वाहन बनकर सजते हैं।
The aarti sees the one Shiva in all three forms: Vishnu (one face, Garuda), Brahma (four faces, swan) and Shiva (five faces, the bull Nandi).
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।Om Jai Shiv Omkara, Swami Jai Shiv Omkara
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥Brahma Vishnu Sadashiv, Ardhangi Dhara
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।Do Bhuj Char Chaturbhuj Dasbhuj Ati Sohe
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥Trigun Roop Nirakhte Tribhuvan Jan Mohe
दो भुजाओं, चार भुजाओं और दस भुजाओं वाले आपके रूप अत्यंत शोभायमान हैं; आपके त्रिगुणात्मक रूप को निहारकर तीनों लोकों के प्राणी मोहित हो जाते हैं।
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।Om Jai Shiv Omkara, Swami Jai Shiv Omkara
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥Brahma Vishnu Sadashiv, Ardhangi Dhara
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।Akshamala Vanamala Mundamala Dhari
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी॥Chandan Mrigmad Sohai Bhale Shashidhari
आप रुद्राक्ष की अक्षमाला, वनपुष्पों की वनमाला और मुण्डों की माला धारण करते हैं; चंदन और कस्तूरी आपको शोभित करते हैं और आपके मस्तक पर चंद्रमा विराजता है।
दूसरी पंक्ति का एक प्रचलित पाठ: "त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी"।
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।Om Jai Shiv Omkara, Swami Jai Shiv Omkara
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥Brahma Vishnu Sadashiv, Ardhangi Dhara
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।Shvetambar Pitambar Baghambar Ange
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥Sanakadik Garunadik Bhootadik Sange
आपके अंगों पर श्वेत वस्त्र, पीतांबर और बाघंबर शोभित हैं; सनक आदि ऋषि, गरुड़ आदि और भूत-गण सदा आपके साथ रहते हैं।
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।Om Jai Shiv Omkara, Swami Jai Shiv Omkara
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥Brahma Vishnu Sadashiv, Ardhangi Dhara
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूलधारी।Kar Ke Madhya Kamandalu Chakra Trishuldhari
सुखकारी दुखहारी जगपालनकारी॥Sukhkari Dukhhari Jagpalankari
आपके हाथों में कमंडलु, चक्र और त्रिशूल हैं; आप सुख देने वाले, दुःख हरने वाले और जगत का पालन करने वाले हैं।
पुराना मुद्रित पाठ: "चक्र त्रिशूल धर्ता। जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥"
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।Om Jai Shiv Omkara, Swami Jai Shiv Omkara
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥Brahma Vishnu Sadashiv, Ardhangi Dhara
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।Brahma Vishnu Sadashiv Janat Aviveka
प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥Pranavakshar Madhye Ye Teenon Eka
अविवेकी लोग ही ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को अलग-अलग जानते हैं; प्रणव अक्षर ॐ में ये तीनों एक ही हैं।
Some prints read "प्रणवाक्षर के मध्ये" (same meaning).
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।Om Jai Shiv Omkara, Swami Jai Shiv Omkara
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥Brahma Vishnu Sadashiv, Ardhangi Dhara
लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।Lakshmi Va Savitri Parvati Sanga
पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥Parvati Ardhangi, Shivalahari Ganga
लक्ष्मी, सावित्री और पार्वती आपके साथ हैं; पार्वती आपकी अर्धांगिनी हैं और गंगा शिव की लहर बनकर बहती हैं।
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।Om Jai Shiv Omkara, Swami Jai Shiv Omkara
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥Brahma Vishnu Sadashiv, Ardhangi Dhara
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।Parvat Sohain Parvati, Shankar Kailasa
भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥Bhang Dhatur Ka Bhojan, Bhasmi Mein Vasa
पर्वत पर पार्वती शोभा पाती हैं और शंकर कैलास पर विराजते हैं; भांग और धतूरा उनका भोजन है और भस्म में उनका वास है।
Variant second line (revivingcultures and some recordings): "भांग धतूरा भस्म चढ़ावत, भोजन फलनिवासा".
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।Om Jai Shiv Omkara, Swami Jai Shiv Omkara
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥Brahma Vishnu Sadashiv, Ardhangi Dhara
जटा में गंगा बहत है, गल मुण्डन माला।Jata Mein Ganga Bahat Hai, Gal Mundan Mala
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥Shesh Naag Liptavat, Odhat Mrigchhala
आपकी जटाओं में गंगा बहती हैं और गले में मुण्डों की माला है; शेषनाग आपसे लिपटे रहते हैं और आप मृगछाला ओढ़ते हैं।
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।Om Jai Shiv Omkara, Swami Jai Shiv Omkara
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥Brahma Vishnu Sadashiv, Ardhangi Dhara
काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी।Kashi Mein Viraje Vishwanath, Nandi Brahmachari
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥Nit Uth Darshan Pavat, Mahima Ati Bhari
काशी में आप विश्वनाथ के रूप में विराजते हैं, ब्रह्मचारी नंदी आपके सामने हैं; जो नित्य उठकर आपके दर्शन पाते हैं, उनके लिए आपकी महिमा अपार है।
Older printed version: "काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी। नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी॥"
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।Om Jai Shiv Omkara, Swami Jai Shiv Omkara
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥Brahma Vishnu Sadashiv, Ardhangi Dhara
त्रिगुणस्वामी जी की आरती, जो कोई नर गावे।Trigunswami Ji Ki Aarti, Jo Koi Nar Gave
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥Kahat Shivanand Swami, Manvanchhit Phal Pave
स्वामी शिवानंद कहते हैं कि जो कोई त्रिगुणों के स्वामी (शिव) की यह आरती गाता है, उसे मनोवांछित फल मिलता है।
This closing stanza carries the poet's signature (chhap): Swami Shivanand.
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।Om Jai Shiv Omkara, Swami Jai Shiv Omkara
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥Brahma Vishnu Sadashiv, Ardhangi Dhara
पूर्ण
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प्रश्न
ॐ जय शिव ओंकारा आरती कब गाई जाती है?
शिव पूजा के अंत में, शिवलिंग या प्रतिमा के सामने घी का दीपक या कपूर घुमाते हुए। ज़्यादातर घरों में यह सुबह और शाम की पूजा में गाई जाती है। सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि पर इसका ख़ास चलन है, और कई मंदिरों में अभिषेक के बाद यही आरती होती है।
ॐ जय शिव ओंकारा आरती किसने लिखी?
परंपरा के अनुसार स्वामी शिवानंद ने। अंतिम पद में "कहत शिवानंद स्वामी" आता है। उनके बारे में इससे ज़्यादा कोई पक्की जानकारी नहीं मिलती।
शिव आरती में ब्रह्मा और विष्णु का उल्लेख क्यों है?
क्योंकि यह आरती तीनों को एक मानती है। इसमें शिव ब्रह्मा, विष्णु और अपने, तीनों के चिह्न धारण किए दिखते हैं। फिर कहा जाता है कि ॐ में ये तीनों एक हैं: सृष्टि करने वाले ब्रह्मा, पालन करने वाले विष्णु और संहार करने वाले शिव।
अलग-अलग पुस्तकों में पंक्तियाँ अलग क्यों हैं?
आरतियाँ सुन-सुनकर और छोटी पुस्तिकाओं से आगे बढ़ीं, इसलिए अलग-अलग इलाक़ों में अलग पाठ बन गए। पुराने संग्रहों में लगभग नौ पद हैं। पार्वती, कैलास और काशी विश्वनाथ वाले पदों सहित पूरा रूप आज ज़्यादातर रिकॉर्डिंग में गाया जाता है। हमने यही पाठ दिया है और हर पद के नीचे मुख्य पाठभेद लिखे हैं।
स्रोत और समीक्षा
स्रोत: Traditional Hindi aarti; full sung form as given by drikpanchang.com "Shri Shiv Ji Ki Aarti", cross-checked with revivingcultures.com, hindi.webdunia.com and shivchalisahindi.com
Two versions circulate. Older prints (webdunia, shivchalisahindi) give 9 stanzas with some different lines; the fuller 11-stanza form (drikpanchang, revivingcultures) is what most families and recordings sing today, so we follow it. Where the two full-form sources differ we chose the reading attested by the most sources and recorded the alternative in each stanza's note (stanzas 3, 5, 6, 8, 10).
मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।
ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।