अच्युताष्टकम्
Achyutashtakam
अच्युताष्टकम् भगवान विष्णु का आठ श्लोकों का संस्कृत स्तोत्र है, जिसे आदि शंकराचार्य की रचना माना जाता है। यह "अच्युतं केशवं रामनारायणं" से शुरू होता है। इसमें प्रभु के पावन नामों की माला है, और सीतापति राम व गोपियों के प्रिय कृष्ण के रूप में उनका स्मरण है। अंत में एक फलश्रुति श्लोक है, और इसकी सरल, लहराती लय में बच्चे भी आसानी से गा लेते हैं।
- 9 पद
- 4 मिनट
- आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है
- उत्तम दिन: गुरुवार
अच्युतं केशवं रामनारायणंAchyutam Keshavam Rama Narayanam
कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् ।Krishna Damodaram Vasudevam Harim
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभंSridharam Madhavam Gopika Vallabham
जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ॥Janaki Nayakam Ramachandram Bhaje
मैं अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव और हरि को; श्रीधर, माधव, गोपियों के प्रिय, जानकीनाथ रामचंद्र को भजता हूँ।
- अच्युतंअच्युत, कभी न गिरने वाले
- केशवंकेशव
- रामनारायणंराम, नारायण
- कृष्णदामोदरंकृष्ण, दामोदर
- वासुदेवंवासुदेव
- हरिम्हरि
- श्रीधरंश्रीधर
- माधवंमाधव
- गोपिकावल्लभंगोपियों के प्रिय
- जानकीनायकंजानकीनाथ
- रामचन्द्रंरामचंद्र
- भजेभजता हूँ
अच्युतं केशवं सत्यभामाधवंAchyutam Keshavam Satyabhama Dhavam
माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम् ।Madhavam Sridharam Radhikaradhitam
इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरंIndira Mandiram Chetasa Sundaram
देवकीनन्दनं नन्दजं सन्दधे ॥Devaki Nandanam Nandajam Sandadhe
अच्युत, केशव, सत्यभामा के पति; माधव, श्रीधर, राधा द्वारा आराधित; लक्ष्मी के निवास, मन को मोहने वाले सुंदर; देवकी-नंदन, नंद के लाल, उन्हें मैं अपने हृदय में धारण करता हूँ।
- सत्यभामाधवंसत्यभामा के पति
- राधिकाराधितम्राधा द्वारा आराधित
- इन्दिरामन्दिरंलक्ष्मी के निवास
- चेतसा सुन्दरंमन को सुंदर लगने वाले
- देवकीनन्दनंदेवकी के पुत्र
- नन्दजंनंद के पुत्र
- सन्दधेहृदय में धारण करता हूँ
विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणेVishnave Jishnave Shankhine Chakrine
रुक्मिणीरागिणे जानकीजानये ।Rukmini Ragine Janaki Janaye
वल्लवीवल्लभायार्चितायात्मनेVallavi Vallabhayarchitayatmane
कंसविध्वंसिने वंशिने ते नमः ॥Kamsa Vidhvamsine Vamshine Te Namah
आपको नमस्कार है: विष्णु को, सदा विजयी को, शंख-चक्रधारी को; रुक्मिणी के प्रेमी को, जानकी के पति को; गोपियों के प्रिय, पूजित, सबकी आत्मा को; कंस का विध्वंस करने वाले, वंशीधारी को।
- विष्णवेविष्णु को
- जिष्णवेविजयी को
- शङ्खिने चक्रिणेशंख-चक्रधारी को
- रुक्मिणीरागिणेरुक्मिणी के प्रेमी को
- जानकीजानयेजानकी के पति को
- वल्लवीवल्लभायगोपियों के प्रिय को
- अर्चितायपूजित को
- आत्मनेसबकी आत्मा को
- कंसविध्वंसिनेकंस का विध्वंस करने वाले को
- वंशिनेवंशीधारी को
- ते नमःआपको नमस्कार
कृष्ण गोविन्द हे राम नारायणKrishna Govinda He Rama Narayana
श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे ।Sripate Vasudevajita Srinidhe
अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षजAchyutananta He Madhavadhokshaja
द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक ॥Dvaraka Nayaka Draupadi Rakshaka
हे कृष्ण, गोविंद, हे राम, नारायण! हे श्रीपति, वासुदेव, अजेय, श्री की निधि! हे अच्युत, अनंत, हे माधव, इंद्रियों से परे अधोक्षज! हे द्वारकाधीश, द्रौपदी के रक्षक!
- कृष्ण गोविन्दहे कृष्ण, हे गोविंद
- हे राम नारायणहे राम, नारायण
- श्रीपतेहे श्रीपति
- वासुदेवहे वासुदेव
- अजितहे अजेय
- श्रीनिधेहे श्री की निधि
- अच्युत अनन्तहे अच्युत, हे अनंत
- हे माधव अधोक्षजहे माधव, हे अधोक्षज
- द्वारकानायकहे द्वारकाधीश
- द्रौपदीरक्षकहे द्रौपदी के रक्षक
राक्षसक्षोभितः सीतया शोभितोRakshasa Kshobhitah Sitaya Shobhito
दण्डकारण्यभूपुण्यताकारणम् ।Dandakaranya Bhu Punyata Karanam
लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितो-Lakshmanenanvito Vanaraih Sevito
ऽगस्त्यसम्पूजितो राघवः पातु माम् ॥Agastya Sampujito Raghavah Patu Mam
राघव मेरी रक्षा करें, जिन्होंने राक्षसों को क्षुब्ध किया, जो सीता से सुशोभित हैं, जिनके चरणों से दंडकारण्य की भूमि पवित्र हुई; जो लक्ष्मण के साथ हैं, वानरों से सेवित हैं और महर्षि अगस्त्य द्वारा पूजित हैं।
- राक्षसक्षोभितःराक्षसों को क्षुब्ध करने वाले
- सीतया शोभितःसीता से सुशोभित
- दण्डकारण्यभूपुण्यताकारणम्दंडकारण्य की भूमि की पवित्रता का कारण
- लक्ष्मणेनान्वितःलक्ष्मण के साथ
- वानरैः सेवितःवानरों से सेवित
- अगस्त्यसम्पूजितःअगस्त्य मुनि द्वारा पूजित
- राघवः पातु माम्राघव मेरी रक्षा करें
धेनुकारिष्टहाऽनिष्टकृद्द्वेषिणांDhenukarishtahanishta Krid Dveshinam
केशिहा कंसहृद्वंशिकावादकः ।Keshiha Kamsahrid Vamshika Vadakah
पूतनाकोपकः सूरजाखेलनोPutana Kopakah Suraja Khelano
बालगोपालकः पातु मां सर्वदा ॥Bala Gopalakah Patu Mam Sarvada
बाल गोपाल सदा मेरी रक्षा करें, जिन्होंने धेनुक और अरिष्ट का वध किया और द्वेषियों का अनिष्ट किया, जिन्होंने केशी को मारा और कंस का संहार किया, जो बाँसुरी बजाते हैं, जिन्होंने पूतना को परास्त किया और जो सूर्यपुत्री यमुना के तट पर क्रीड़ा करते थे।
- धेनुकारिष्टहाधेनुक और अरिष्ट का वध करने वाले
- अनिष्टकृद्द्वेषिणांद्वेषियों का अनिष्ट करने वाले
- केशिहाकेशी का वध करने वाले
- कंसहृत्कंस का संहार करने वाले
- वंशिकावादकःबाँसुरी बजाने वाले
- पूतनाकोपकःपूतना पर कुपित होने वाले
- सूरजाखेलनःयमुना-तट पर क्रीड़ा करने वाले
- बालगोपालकःबाल गोपाल
- पातु मां सर्वदासदा मेरी रक्षा करें
विद्युदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वाससंVidyududyotavat Prasphurad Vasasam
प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम् ।Pravrid Ambhodavat Prollasad Vigraham
वन्यया मालया शोभितोरःस्थलंVanyaya Malaya Shobhitorahsthalam
लोहिताङ्घ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे ॥Lohitanghri Dvayam Varijaksham Bhaje
मैं उन कमलनयन प्रभु को भजता हूँ, जिनका वस्त्र बिजली की चमक-सा दमकता है, जिनका श्याम विग्रह वर्षा के मेघ-सा शोभित है, जिनका वक्षस्थल वनमाला से सजा है और जिनके दोनों चरण अरुण हैं।
- विद्युदुद्योतवत्बिजली की चमक के समान
- प्रस्फुरद्वाससंचमकते वस्त्र वाले
- प्रावृडम्भोदवत्वर्षा ऋतु के मेघ के समान
- प्रोल्लसद्विग्रहम्जिनका विग्रह दीप्त है
- वन्यया मालयावनमाला से
- शोभितोरःस्थलंसुशोभित वक्षस्थल वाले
- लोहिताङ्घ्रिद्वयंलाल चरण-युगल वाले
- वारिजाक्षंकमलनयन
- भजेभजता हूँ
कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजमानाननंKunchitaih Kuntalair Bhrajamananam
रत्नमौलिं लसत्कुण्डलं गण्डयोः ।Ratna Maulim Lasat Kundalam Gandayoh
हारकेयूरकं कङ्कणप्रोज्ज्वलंHara Keyurakam Kankana Projjvalam
किङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे ॥Kinkini Manjulam Shyamalam Tam Bhaje
मैं उन श्याम प्रभु को भजता हूँ, जिनका मुख घुँघराले केशों से दमकता है, जो रत्न-मुकुट और गालों पर झिलमिलाते कुंडल धारण करते हैं, जो हार और बाजूबंद से सजे हैं, कंगनों से दीप्त हैं और किंकिणी की मधुर ध्वनि से मनोहर हैं।
- कुञ्चितैः कुन्तलैःघुँघराले केशों से
- भ्राजमानाननंजिनका मुख दमकता है
- रत्नमौलिंरत्न-मुकुटधारी
- लसत्कुण्डलं गण्डयोःगालों पर चमकते कुंडलों वाले
- हारकेयूरकंहार और बाजूबंद वाले
- कङ्कणप्रोज्ज्वलंकंगनों से दीप्त
- किङ्किणीमञ्जुलंकिंकिणी से मनोहर
- श्यामलं तं भजेउन श्याम प्रभु को भजता हूँ
अच्युतस्याष्टकं यः पठेदिष्टदंAchyutasyashtakam Yah Pathed Ishtadam
प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम् ।Prematah Pratyaham Purushah Saspriham
वृत्ततः सुन्दरं वेद्यविश्वम्भरंVrittatah Sundaram Vedya Vishvambharam
तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम् ॥Tasya Vashyo Harir Jayate Satvaram
जो मनुष्य छंद में सुंदर, इच्छित फल देने वाले और विश्वंभर प्रभु का बोध कराने वाले इस अच्युताष्टक का प्रतिदिन प्रेम और उत्कंठा से पाठ करता है, परंपरा कहती है कि हरि शीघ्र ही उसके प्रेम के वश हो जाते हैं।
- अच्युतस्याष्टकंअच्युत के इस अष्टक को
- यः पठेत्जो पढ़े
- इष्टदंइच्छित फल देने वाले
- प्रेमतःप्रेम से
- प्रत्यहंप्रतिदिन
- पूरुषःमनुष्य
- सस्पृहम्उत्कंठा से
- वृत्ततः सुन्दरंछंद में सुंदर
- वेद्यविश्वम्भरंजिससे विश्वंभर जाने जाते हैं
- तस्यउसके
- वश्यः हरिः जायतेहरि वश में हो जाते हैं
- सत्वरम्शीघ्र
नौवाँ श्लोक फलश्रुति है, जो पाठ का फल बताता है।
पूर्ण
अच्युताष्टकम् का पाठ पूर्ण हुआ।
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प्रश्न
अच्युताष्टकम् किसने लिखा?
परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है, जो ८वीं शताब्दी के अद्वैत वेदांत के आचार्य थे। उनके स्थापित शृंगेरी शारदा पीठ में इसे उनके स्तोत्रों में गिना जाता है। उनसे जुड़े कई स्तोत्रों की तरह विद्वान इसके रचयिता पर बहस करते हैं, पर इसे उनकी रचना मानकर पढ़ने की परंपरा पुरानी है।
क्या "अच्युतम् केशवम् कृष्ण दामोदरम्" और अच्युताष्टकम् एक ही हैं?
नहीं। लोकप्रिय भजन "अच्युतम् केशवम् कृष्ण दामोदरम्, राम नारायणम् जानकी वल्लभम्" एक अलग, बाद का गीत है। शंकराचार्य का अच्युताष्टकम् "अच्युतं केशवं रामनारायणं, कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्" से शुरू होता है, और इसमें आठ श्लोक व एक फलश्रुति है। दोनों के बस आरंभिक शब्द मिलते हैं।
अच्युताष्टकम् में कितने श्लोक हैं?
नौ: आठ श्लोक, जैसा "अष्टकम्" नाम से पता चलता है, और एक फलश्रुति। आराम से पढ़ें तो लगभग चार मिनट लगते हैं।
अच्युताष्टकम् के पाठ के क्या लाभ हैं?
इसकी अपनी फलश्रुति कहती है कि जो रोज़ प्रेम से इसका पाठ करता है, हरि जल्दी ही उसकी भक्ति के वश हो जाते हैं, और यह मनचाहा फल देता है। ये भक्ति की मान्यताएँ हैं, कोई गारंटी नहीं। परंपरा इसे मुख्य रूप से प्रभु के प्रति स्थिर प्रेम बढ़ाने वाला मानती है।
अच्युताष्टकम् कब पढ़ना चाहिए?
पूजा के किसी भी समय। सुबह स्नान के बाद या शाम को दीया जलाते समय, दोनों पारंपरिक हैं, और गुरुवार व एकादशी विष्णु जी के ख़ास दिन हैं। छंद सरल और संगीत भरा है, इसलिए बच्चों को सिखाने के लिए यह अच्छा पहला संस्कृत स्तोत्र है।
स्रोत और समीक्षा
स्रोत: Achyutashtakam of Adi Shankaracharya as given by Sringeri Sharada Peetham (sringeri.net, Vishnu stotras) and stotranidhi.com (Prabhata Stotranidhi, Devanagari); cross-checked against sanskritdocuments.org (achyuta8) and sa.wikisource.org (अच्युताष्टकम्)
We follow the Sringeri Sharada Peetham reading, which stotranidhi matches word for word. sanskritdocuments.org and wikisource differ in four places: 2 नन्दनं for नन्दजं; 5 दण्डकारण्यभूपुण्यताकारणः for ...कारणम्; 6 धेनुकारिष्टकोऽनिष्टकृद् for धेनुकारिष्टहाऽनिष्टकृद्; 9 कर्तृ विश्वम्भरं/विश्वम्भरः for वेद्यविश्वम्भरं. Meanings are Nitya's own.
मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।
ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।