श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन

Shri Ramchandra Kripalu Bhaju Man

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन गोस्वामी तुलसीदास की पाँच छंदों की राम-स्तुति है, जो उनकी विनय पत्रिका का पद ४५ है। इसमें तुलसीदास अपने मन से कहते हैं कि संसार के दारुण भय को हरने वाले कृपालु श्रीराम का भजन कर, और उनके कमल जैसे नेत्रों, मेघ-श्याम शरीर और पीताम्बर का वर्णन करते हैं। इसे राम नवमी और दीपावली पर, भजन संध्याओं में, सुंदरकांड और रामायण पाठ के बाद और रोज़ की संध्या-प्रार्थना में गाते हैं।

  • 5 पद
  • 3 मिनट
  • गोस्वामी तुलसीदास (विनय पत्रिका, पद ४५)

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श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।Shri Ramchandra Kripalu Bhaju Man Haran Bhav Bhay Darunam

नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर-कंज, पद कंजारुणं॥Nav Kanj Lochan Kanj Mukh Kar Kanj Pad Kanjarunam

हे मन, कृपालु श्रीरामचन्द्रजी का भजन कर, जो संसार के दारुण भय को हरने वाले हैं। उनके नेत्र नव-विकसित कमल के समान हैं, और मुख, हाथ तथा चरण लाल कमल के समान हैं।

कंदर्प अगणित अमित छवि, नवनील नीरद सुंदरं।Kandarp Aganit Amit Chhavi Nav Neel Neerad Sundaram

पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं॥Pat Peet Manahu Tadit Ruchi Shuchi Naumi Janak Sutavaram

उनकी छवि असंख्य कामदेवों से बढ़कर है; वे नवीन नीले जलभरे मेघ के समान सुंदर हैं। उनका पीताम्बर मानो मेघ में बिजली-सा चमक रहा है। ऐसे पावन जानकीपति को मैं नमस्कार करता हूँ।

भजु दीनबंधु दिनेश दानव-दैत्यवंश-निकंदनं।Bhaju Deenbandhu Dinesh Danav Daitya Vansh Nikandanam

रघुनंद आनंदकंद कोसलचंद दशरथ नंदनं॥Raghunand Anandkand Kosalchand Dashrath Nandanam

हे मन, उनका भजन कर जो दीनों के बंधु हैं, सूर्य के समान तेजस्वी हैं और दानव-दैत्यों के वंश का नाश करने वाले हैं; जो रघुकुल के आनंद, आनंद के मूल, कोसल-देश रूपी आकाश के निर्मल चंद्रमा और दशरथ के पुत्र हैं।

सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदार अंग विभूषणं।Sir Mukut Kundal Tilak Charu Udar Ang Vibhushanam

आजानुभुज शर-चाप-धर, संग्राम-जित-खरदूषणं॥Aajanubhuj Shar Chaap Dhar Sangram Jit Khardushanam

उनके मस्तक पर मुकुट, कानों में कुण्डल, माथे पर सुंदर तिलक और अंग-अंग में भव्य आभूषण हैं। उनकी भुजाएँ घुटनों तक लंबी हैं, वे धनुष-बाण धारण किए हैं और उन्होंने संग्राम में खर-दूषण को जीता है।

इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं।Iti Vadati Tulsidas Shankar Shesh Muni Man Ranjanam

मम हृदय कंज निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं॥Mam Hriday Kanj Nivas Kuru Kamadi Khal Dal Ganjanam

तुलसीदास इस प्रकार कहते हैं: हे शिव, शेष और मुनियों के मन को आनंदित करने वाले, काम आदि दुष्ट शत्रुओं के समूह का नाश करने वाले प्रभु, आप मेरे हृदय-कमल में निवास कीजिए।

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प्रश्न

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन किसने लिखा?

गोस्वामी तुलसीदास ने, जो सोलहवीं शताब्दी के कवि-संत और रामचरितमानस के रचयिता हैं। यह उनकी विनय पत्रिका का पद ४५ है, जो श्रीराम से की गई प्रार्थनाओं के पदों का संग्रह है। अंतिम छंद में वे 'इति वदति तुलसीदास' (ऐसा तुलसीदास कहते हैं) कहकर अपना नाम लेते हैं।

क्या 'श्रीरामचन्द्र कृपालु' रामचरितमानस से है?

नहीं। यह तुलसीदास की अलग कृति विनय पत्रिका से है। कई रिकॉर्डिंग में पाँचवें छंद के बाद रामचरितमानस के बालकांड का एक छंद और सोरठा जोड़ा जाता है, जिसमें गौरी जी सीता जी को आशीर्वाद देती हैं। वे पंक्तियाँ दूसरे ग्रंथ की हैं, इसलिए हमने सिर्फ़ पद ४५ के पाँच छंद दिए हैं।

'भजु मन' सही है या 'भजमन'?

दोनों। गीता प्रेस की विनय पत्रिका में 'भजु मन' है, यानी 'हे मन, भजन कर'। गाते समय दोनों शब्द जुड़ जाते हैं, इसलिए लोग अक्सर 'भजमन' लिखते हैं। अर्थ वही रहता है।

यह राम स्तुति कब गाई जाती है?

राम नवमी, दीपावली और दशहरे पर, भजन संध्याओं में, सुंदरकांड और रामायण पाठ के समापन पर, हनुमान जयंती पर और रोज़ की संध्या-प्रार्थना में। परंपरा मानती है कि इसे गाते हुए श्रीराम के रूप का ध्यान करने से भय शांत होता है और मन स्थिर होता है। इसकी पहली पंक्ति भी यही माँगती है।

इसे गाने में कितना समय लगता है?

पाँचों छंद गाने में लगभग तीन मिनट।

स्रोत और समीक्षा

स्रोत: Vinaya Patrika of Goswami Tulsidas, pada 45 (Raga Gauri), Gita Press Gorakhpur edition with Hindi bhavarth, as scanned on Hindi Wikisource (विनय पत्रिका.djvu, pages 79–80); cross-checked against Hindi Wikipedia and BhaktiBharat.com

We follow the Gita Press spelling, including 'भजु मन' (popularly sung 'bhajman'), 'कोसलचंद' and 'उदार'. Popular recordings often continue after stanza 5 with a chhand and sortha from Ramcharitmanas, Balakanda ('मनु जाहि राचेउ मिलहि सो बरु…' and 'जानि गौरि अनुकूल सिय…'), which are Sita's blessing from Gauri and not part of this Vinaya Patrika pada; they are not included here.

मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।

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